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CBSE Three Language Formula: CBSE का बड़ा फैसला: 9वीं-10वीं में अब पढ़नी होंगी 3 भाषाएं, बोर्ड परीक्षा को लेकर मिली बड़ी राहत

AAmandeep Singh
CBSE का बड़ा फैसला: 9वीं-10वीं में अब पढ़नी होंगी 3 भाषाएं, बोर्ड परीक्षा को लेकर मिली बड़ी राहत
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दिल्ली। देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्ड, सीबीएसई ने माध्यमिक स्तर (9वीं और 10वीं) के पाठ्यक्रम को लेकर एक दूरगामी आदेश जारी किया है। नए भाषाई फॉर्मूले के तहत अब छात्रों के लिए भाषाओं का दायरा बढ़ा दिया गया है। बोर्ड द्वारा स्पष्ट किए गए नियमों के अनुसार, विद्यार्थियों को अब तीन भाषाओं (R1, R2 और R3) का अध्ययन करना होगा। इस त्रि-भाषा सूत्र की सबसे खास बात यह है कि चुने गए तीन विकल्पों में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय होनी चाहिए। इस कदम के जरिए बोर्ड देश की सांस्कृतिक विविधता, लोक-जीवन और भारतीय भाषाओं के प्रति युवा पीढ़ी में रुचि जगाने की कोशिश कर रहा है।

तीसरी भाषा का विकल्प खुला, विदेशी भाषाएं भी सूची में शामिल

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सीबीएसई ने उन छात्रों की सहूलियत का भी ध्यान रखा है जो वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए विदेशी भाषाएं सीखना चाहते हैं। आदेश के मुताबिक, छात्र अपनी तीसरी भाषा के रूप में किसी भी मान्यता प्राप्त विदेशी भाषा का चयन कर सकते हैं। हालांकि, इसके साथ ही यह शर्त भी जुड़ी होगी कि बाकी की दो भाषाएं अनिवार्य रूप से भारतीय ही होनी चाहिए। इस हाइब्रिड मॉडल से छात्रों को अपनी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़े रहने के साथ-साथ वैश्विक संवाद के लिए तैयार होने का मौका भी मिलेगा।

नो बोर्ड एग्जाम: स्कूल स्तर पर ही आंका जाएगा तीसरी भाषा का ज्ञान

अक्सर देखा जाता है कि पाठ्यक्रम में कोई भी नया विषय जुड़ते ही छात्रों और अभिभावकों पर परीक्षाओं का तनाव बढ़ जाता है। इस मनोवैज्ञानिक पहलू को समझते हुए सीबीएसई ने एक बेहद व्यावहारिक रास्ता निकाला है। बोर्ड ने साफ किया है कि तीसरी भाषा (R3) की पढ़ाई भले ही अनिवार्य होगी, लेकिन 10वीं की मुख्य बोर्ड परीक्षा में इसका कोई अलग से लिखित प्रश्न पत्र नहीं आएगा। इस विषय का पूरा मूल्यांकन स्कूल प्रबंधन अपने स्तर पर प्रैक्टिकल, प्रोजेक्ट वर्क या आंतरिक परीक्षाओं के माध्यम से करेगा। इससे छात्रों पर अंकों की अंधी दौड़ का दबाव नहीं रहेगा और वे बिना किसी तनाव के नई भाषा सीख सकेंगे।

शिक्षकों की कमी और इंफ्रास्ट्रक्चर: स्कूलों के सामने खड़ी होगी बड़ी दीवार

कागजी स्तर पर यह नीति जितनी आकर्षक और भविष्योन्मुखी नजर आती है, धरातल पर इसे लागू करना उतना ही पेचीदा माना जा रहा है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि 1 जुलाई 2026 से इस नियम को लागू करने के लिए स्कूलों के पास बहुत कम समय है। सबसे बड़ी चुनौती योग्य और प्रशिक्षित भाषा शिक्षकों (Language Teachers) की कमी को पूरा करना है। मेट्रो शहरों के बड़े स्कूलों को छोड़कर, देश के दूर-दराज के इलाकों या छोटे कस्बों में चल रहे सीबीएसई स्कूलों के लिए अलग-अलग भारतीय और विदेशी भाषाओं के शिक्षक ढूंढना और उनके वेतन का प्रबंधन करना एक टेढ़ी खीर साबित होने वाला है।

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