Char Dham Yatra closing: उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के समापन की तारीखें तय हो गई हैं। गंगोत्री धाम के कपाट 10 नवंबर को बंद होंगे, जबकि केदारनाथ और यमुनोत्री धाम के कपाट 11 नवंबर को बंद किए जाएंगे। बद्रीनाथ धाम के कपाट 16 नवंबर को बंद होंगे। इन तारीखों के साथ ही चारों धामों की इस साल की ग्रीष्मकालीन यात्रा का समापन हो जाएगा। इस यात्रा सीजन में अब तक कुल 56 लाख 19 हजार श्रद्धालु चारों धामों में दर्शन कर चुके हैं। इनमें सबसे अधिक 20.69 लाख श्रद्धालु बद्रीनाथ और 17.65 लाख श्रद्धालु केदारनाथ पहुंचे हैं। मौसम ने ज्यादातर समय यात्रा का साथ दिया, लेकिन अलग-अलग मौकों पर खराब मौसम और अन्य परिस्थितियों के कारण यात्रा रोकनी भी पड़ी।
यात्रा के दौरान अब तक 271 श्रद्धालुओं की मौत होने की जानकारी सामने आई है। इनमें केदारनाथ धाम में सबसे अधिक 132 श्रद्धालुओं की जान गई। कपाट बंद होने के बाद चारों धामों की उत्सव मूर्तियों और धार्मिक गद्दियों को उनके शीतकालीन प्रवास स्थलों पर ले जाया जाएगा। यहां अगले यात्रा सीजन तक नियमित पूजा-अर्चना होती रहेगी। चारों धामों के कपाट बंद होने की प्रक्रिया में विशेष पूजा-अर्चना और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद भगवान केदारनाथ, भगवान बदरीविशाल, मां गंगा और मां यमुना की उत्सव मूर्तियों को निर्धारित शीतकालीन प्रवास स्थलों पर ले जाया जाता है। इस व्यवस्था के कारण ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के दौरान भी श्रद्धालु संबंधित शीतकालीन मंदिरों में दर्शन कर सकते हैं। हालांकि, यात्रा करने से पहले स्थानीय मौसम, सड़क की स्थिति और मंदिरों के दर्शन संबंधी व्यवस्था की जानकारी लेना जरूरी है।
केदारनाथ: ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में होगी पूजा
केदारनाथ धाम के कपाट बंद होने के बाद भगवान केदारनाथ की पंचमुखी उत्सव डोली को विशेष पूजा-अर्चना के साथ विदा किया जाता है। इस डोली में भगवान केदारनाथ के पंचमुखी स्वरूप की पूजा होती है। डोली की यात्रा के दौरान स्थानीय ग्रामीण और श्रद्धालु जगह-जगह उसका स्वागत करते हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों और बाबा केदार के जयकारों से पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है। भगवान केदारनाथ की उत्सव डोली शीतकालीन प्रवास के लिए ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर पहुंचती है। यह मंदिर बाबा केदार की शीतकालीन गद्दी के रूप में प्रसिद्ध है। यहां सर्दियों के दौरान भी भगवान केदारनाथ की नियमित पूजा-अर्चना होती है और श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं। केदारनाथ धाम में इस यात्रा सीजन के दौरान 17.65 लाख श्रद्धालु पहुंचे हैं। हालांकि, चारधाम यात्रा के दौरान दर्ज 271 मौतों में से 132 मौतें अकेले केदारनाथ में हुई हैं। ये आंकड़े ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यात्रा के दौरान स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों, मौसम की जानकारी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के महत्व को भी सामने रखते हैं।
बद्रीनाथ: घृत कंबल की परंपरा के साथ बंद होंगे कपाट
बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने से पहले मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और पंच पूजाएं की जाती हैं। कपाट बंद होने के अंतिम दिन भगवान बदरीविशाल को घृत कंबल ओढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है। माणा गांव की महिलाएं ऊन से यह कंबल तैयार करती हैं और इसे शुद्ध घी में भिगोया जाता है। भगवान के श्रृंगार से आभूषण हटाने के बाद उन्हें यह कंबल ओढ़ाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, घृत कंबल की परंपरा सर्दियों में भगवान की रक्षा और सुख-समृद्धि से जुड़ी है। कपाट बंद होने से पहले मां लक्ष्मी की प्रतिमा को उनके मंदिर से भगवान बदरीविशाल के गर्भगृह में विराजमान किया जाता है। मान्यता है कि शीतकाल में मां लक्ष्मी भगवान नारायण के साथ गर्भगृह में विराजती हैं।
कपाट बंद होने के समय मंदिर परिसर में सेना का बैंड भक्ति धुनें बजाता है और श्रद्धालु भगवान बदरीविशाल को विदाई देते हैं। इसके बाद भगवान उद्धव और कुबेर की उत्सव मूर्तियों को पांडुकेश्वर स्थित योगध्यान बदरी मंदिर ले जाया जाता है, जबकि आदि गुरु शंकराचार्य की गद्दी ज्योतिर्मठ स्थित नरसिंह मंदिर पहुंचती है। बद्रीनाथ धाम इस यात्रा सीजन में श्रद्धालुओं की संख्या के मामले में सबसे आगे रहा है। यहां अब तक 20.69 लाख श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। 16 नवंबर को कपाट बंद होने के बाद भी बदरीनाथ से जुड़ी शीतकालीन धार्मिक परंपराएं निर्धारित स्थलों पर जारी रहेंगी।
गंगोत्री: मुखबा में छह महीने तक होगी मां गंगा की पूजा
गंगोत्री धाम के कपाट 10 नवंबर को बंद होंगे। इसके बाद मां गंगा की उत्सव डोली शीतकालीन प्रवास के लिए उत्तरकाशी जिले के मुखबा गांव पहुंचेगी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मुखबा मां गंगा का मायका है। यहां मां गंगा की प्रतिमा को मंदिर में विराजमान किया जाता है और अगले छह महीने तक पूजा-अर्चना जारी रहती है। मां गंगा की डोली की यात्रा में मुखबा के आराध्य सोमेश्वर देवता की विशेष भूमिका मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सोमेश्वर देवता मां गंगा की अगवानी करते हैं। डोली यात्रा के दौरान स्थानीय लोग और श्रद्धालु पारंपरिक वाद्ययंत्रों तथा गढ़वाल स्काउट्स के बैंड की धुनों के बीच जयकारे लगाते हुए साथ चलते हैं।
मुखबा पहुंचने पर मां गंगा का स्वागत किया जाता है और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ शीतकालीन पूजा शुरू होती है। अगले वर्ष वसंत ऋतु में गंगोत्री धाम के कपाट खुलने पर मां गंगा की उत्सव डोली फिर धाम लौटती है। इस तरह ऊंचाई वाले मंदिर के कपाट बंद रहने के दौरान भी श्रद्धालुओं के लिए पूजा और दर्शन की परंपरा बनी रहती है।
यमुनोत्री: खरसाली में होंगे मां यमुना के दर्शन
यमुनोत्री धाम के कपाट 11 नवंबर को बंद होंगे। इसके बाद मां यमुना की उत्सव डोली शीतकालीन प्रवास के लिए खरसाली गांव पहुंचेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, खरसाली मां यमुना का मायका है। सर्दियों के दौरान यहां मां यमुना की पूजा-अर्चना होती है और श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं। खरसाली में मां यमुना के भाई शनिदेव का मंदिर भी स्थित है। स्थानीय परंपरा में शनिदेव को मां यमुना का रक्षक माना जाता है। कपाट बंद होने के बाद मां यमुना की डोली को पारंपरिक रीति-रिवाजों और विशेष पूजा-अर्चना के साथ खरसाली लाया जाता है।
ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री धाम में सर्दियों के दौरान अत्यधिक ठंड और बर्फबारी के कारण पहुंचना कठिन हो जाता है। ऐसे में खरसाली में पूजा जारी रहने से श्रद्धालु शीतकाल में भी मां यमुना के दर्शन कर सकते हैं। चारों धामों के कपाट बंद होने के साथ ही उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन तीर्थयात्रा का यह चरण पूरा हो जाएगा। इसके बाद शीतकालीन मंदिरों में पूजा-अर्चना जारी रहेगी और अगले यात्रा सीजन में कपाट खुलने के साथ श्रद्धालुओं की आवाजाही फिर शुरू होगी। केदारनाथ पैदल मार्ग पर लगातार गिर रहे पत्थर: यात्रा तीसरे दिन भी बंद, 7 हजार यात्री सुरक्षित निकाले गए; हेलीसेवा शुरू

