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सीजेआई ने ‘ज्यूडीशियल करप्शन’ चैप्टर वाली NCERT किताब की बिक्री पर लगाई रोक: कहा- यह ज्यूडीशरी पर सोचा समझा हमला

VVinita Kohli
सीजेआई ने ‘ज्यूडीशियल करप्शन’ चैप्टर वाली NCERT किताब की बिक्री पर लगाई रोक: कहा- यह ज्यूडीशरी पर सोचा समझा हमला
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की आपत्ति के बाद ‘ज्यूडीशियल करप्शन’ चैप्टर वाली एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुस्तक की बिक्री पर रोक लगा दी गई है। एनसीईआरटी सूत्रों ने समाचार एजेंसी एएनआई को इसकी पुष्टि की। यह मुद्दा बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में उठा, जहां सीजेआई ने कहा कि दुनिया में किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी और वह इस मामले को स्वयं देखेंगे। मामला वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी ने उठाया था।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ

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सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस विपुल एम पंचोली और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष यह मुद्दा रखा गया। कपिल सिब्बल ने कहा कि एनसीईआरटी की कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है, जो निंदनीय है। अभिषेक सिंघवी ने तर्क दिया कि किताब में राजनीति, नौकरशाही और अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार का उल्लेख नहीं है, जिससे एकतरफा संदेश जाता है। इस पर सीजेआई ने कहा कि उन्हें जानकारी है और यह एक सोची-समझी तथा गहरी साजिश प्रतीत होती है।

नई किताब में क्या है

NCERT ने 23 फरवरी को कक्षा 8 के लिए सोशल साइंस की नई पुस्तक जारी की थी। इसका नाम Exploring Society: India and Beyond Part 2 है और इसे शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू किया जाना था। जुलाई 2025 में इसका पहला भाग जारी हुआ था। पुस्तक के ‘The Role of the Judiciary in Our Society’ अध्याय में ‘Corruption in the Judiciary’ शीर्षक से एक खंड जोड़ा गया है।

इस अध्याय में न्यायपालिका के समक्ष चुनौतियों का उल्लेख करते हुए भ्रष्टाचार, लंबित मामलों की संख्या और जजों की कमी को प्रमुख समस्याएं बताया गया है। इसमें कहा गया है कि जज आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो अदालत के भीतर और बाहर उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है। ‘Justice Delayed is Justice Denied’ शीर्षक के तहत लंबित मामलों के आंकड़े भी दिए गए हैं।

लंबित मामलों के आंकड़े

पुस्तक में सुप्रीम कोर्ट में 81 हजार, हाईकोर्ट्स में 62 लाख 40 हजार और जिला व अधीनस्थ अदालतों में 4 करोड़ 70 लाख लंबित मामलों का उल्लेख है। यह भी बताया गया है कि न्यायिक प्रणाली में जवाबदेही के आंतरिक तंत्र मौजूद हैं। सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (CPGRAMS) के माध्यम से शिकायतों की प्रक्रिया का जिक्र किया गया है और 2017 से 2021 के बीच 1,600 से अधिक शिकायतें मिलने की बात कही गई है।

संवैधानिक प्रावधान और फैसले

अध्याय में यह भी समझाया गया है कि गंभीर मामलों में संसद महाभियोग प्रस्ताव पारित कर जज को हटा सकती है, बशर्ते उचित जांच के बाद विचार किया जाए और संबंधित जज को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले। पुस्तक में इलेक्टोरल बॉन्ड योजना का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि 2018 में सरकार ने इसे राजनीतिक चंदा जुटाने के तरीके के रूप में शुरू किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा था कि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को कौन वित्तपोषित कर रहा है।

इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2009 में जोड़े गए एक प्रावधान का भी जिक्र है, जिसके तहत सोशल मीडिया पोस्ट पर दंड का प्रावधान था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करते हुए हटाने का निर्देश दिया था। पुस्तक में पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई के जुलाई 2025 के बयान का उल्लेख भी है, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार के मामलों से सार्वजनिक विश्वास पर पड़ने वाले प्रभाव की बात कही थी।

बिक्री पर रोक

नई पुस्तक को 23 फरवरी को मंजूरी मिली थी, लेकिन अब इसकी बिक्री पर रोक लगा दी गई है। फिलहाल यह न तो ऑनलाइन उपलब्ध है और न ही ऑफलाइन बाजार में। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद इस विषय पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। अदालत की आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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