Cockroach Janata Party: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाए जाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का कानूनी विकल्प मौजूद है। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आने के बजाय पहले उसी वैधानिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करना चाहिए था।
जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद की अदालत में हुई सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं की ओर से एडवोकेट अभिक चिमनी पेश हुए। दिल्ली पुलिस की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और CGSC आशीष दीक्षित ने पक्ष रखा। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के सामने सवाल रखा कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का रास्ता उपलब्ध है, तो सीधे हाईकोर्ट में याचिका क्यों दायर की गई। इसके बाद दोनों नेताओं ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं। कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य आधार उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया थी।
10 अक्टूबर से शुरू हुआ घटनाक्रम
सौरव दास और आशुतोष रांका को 10 अक्टूबर को प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिया गया था। बाद में उन्हें इस शर्त पर जमानत मिली कि वे शांति भंग नहीं करेंगे। इसके बाद 12 अक्टूबर को सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। इसके बावजूद दोनों नेता 13 अक्टूबर को तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे। इसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। 19 अक्टूबर को हिरासत की अवधि पूरी होने पर उनकी कस्टडी दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई। दोनों नेताओं ने मजिस्ट्रेट के इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका मामला सुनते हुए अदालत ने रिवीजन पिटीशन के विकल्प की ओर ध्यान दिलाया, जिसके बाद उन्होंने याचिका वापस ले ली।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या सवाल उठाए?
सुनवाई के दौरान अदालत ने पहले दिए गए बॉन्ड और जंतर-मंतर पहुंचने के फैसले पर सवाल किए। कोर्ट ने कहा कि दोनों नेताओं ने पहले शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया था। यदि बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन होने की आशंका सही पाई गई है, तो अधिकारियों की ओर से नियमों के तहत कार्रवाई करने को गलत कैसे कहा जा सकता है। अदालत ने बैरिकेड पार करने और प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पर भी सवाल उठाए। कोर्ट की टिप्पणी के मुताबिक, प्रदर्शन में दूसरे लोग भी शामिल हो सकते थे और स्थिति बिगड़ सकती थी। अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति लेने का विकल्प मौजूद है, जिससे उपद्रव करने वालों को नियंत्रित किया जा सके।
सुनवाई के दौरान जज ने दोनों नेताओं की उम्र भी पूछी। उनके वकील ने बताया कि एक की उम्र 27 साल और दूसरे की 31 साल है। इस पर अदालत ने टिप्पणी की, “जेन-जी नहीं हैं।” कोर्ट ने उनसे यह भी पूछा कि वे क्या करते हैं, किस संगठन से जुड़े हैं और उस संगठन का उद्देश्य क्या है। अदालत ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के मुद्दे पर भी सवाल किया। कोर्ट ने पूछा कि जब वहां प्रदर्शन को लेकर रोक थी, तो दोनों नेता वहां क्यों गए। सुनवाई में यह भी उल्लेख हुआ कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
अनुच्छेद 226 और रिवीजन पिटीशन में क्या अंतर है?
संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है। इसके तहत कोई व्यक्ति अधिकारों के उल्लंघन या संबंधित कानूनी आधार पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। वहीं, रिवीजन पिटीशन के जरिए कानून में निर्धारित परिस्थितियों में निचली अदालत के आदेश की वैधता और कानूनी प्रक्रिया की जांच की मांग की जा सकती है। इस मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने न्यायिक हिरासत बढ़ाने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने इसी वजह से याचिकाकर्ताओं को पहले उपलब्ध रिवीजन प्रक्रिया अपनाने की बात कही। याचिका वापस लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि हाईकोर्ट ने हिरासत बढ़ाने के आदेश को सही या गलत ठहरा दिया। अदालत की टिप्पणी के बाद दोनों नेताओं ने मौजूदा याचिकाएं वापस लीं। अब वे उपलब्ध कानूनी विकल्प के तहत आगे की कार्रवाई कर सकते हैं।
दिल्ली पुलिस ने सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े जंतर-मंतर मामले को भी क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया है। इससे पहले कनॉट प्लेस में दर्ज मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई थी। अब दोनों मामलों की जांच इसी शाखा के जिम्मे होगी।

