Dengue Symptoms: मानसून के बाद और बदलते मौसम के साथ ही डेंगू का प्रकोप तेजी से पांव पसारने लगता है। अस्पतालों में मरीजों की कतारें लगने लगती हैं और इस बीच सबसे ज्यादा चर्चा जिस एक शब्द की होती है, वह है ‘प्लेटलेट काउंट’। ब्लड टेस्ट रिपोर्ट में जैसे ही यह आंकड़ा 1.5 लाख के मानक स्तर से नीचे गिरता है, मरीज और उसके परिजन अनजाने डर के साए में आ जाते हैं। लेकिन वरिष्ठ चिकित्सकों का स्पष्ट कहना है कि रिपोर्ट में दिखता केवल एक आंकड़ा बीमारी की पूरी तस्वीर बयां नहीं करता। डेंगू कितना खतरनाक मोड़ ले चुका है, इसका फैसला मरीज के शारीरिक लक्षणों और अन्य चिकित्सीय मानकों से होता है।
आखिरकार डेंगू में क्यों घटने लगता है प्लेटलेट का स्तर?
आकाश हेल्थकेयर द्वारका के यूनिट-1 के सीनियर डायरेक्टर डॉ. विक्रम जीत सिंह बताते हैं कि डेंगू वायरस शरीर में प्रवेश करते ही सबसे पहले बोन मैरो पर हमला बोलता है। बोन मैरो हड्डियों के भीतर का वह अहम हिस्सा है जहां रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स का निर्माण होता है। वायरस के प्रभाव से यह निर्माण प्रक्रिया कुछ दिनों के लिए थम सी जाती है। इसके अलावा, शरीर का अपना प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) भी संक्रमण से लड़ते हुए अनजाने में प्लेटलेट्स को तेजी से नष्ट करने लगता है। आमतौर पर संक्रमण के तीसरे से आठवें दिन के बीच प्लेटलेट्स में गिरावट देखी जाती है।
40 हजार तक आ जाए आंकड़ा तो क्या अस्पताल भागना जरूरी है?
चिकित्सा विज्ञान की भाषा में प्लेटलेट काउंट का 1.5 लाख से नीचे जाना ‘थ्रोम्बोसाइटोपेनिया’ कहलाता है। कई बार जांच रिपोर्ट में यह आंकड़ा 50 हजार या 40 हजार तक लुढ़क जाता है। डॉक्टर स्पष्ट करते हैं कि यदि मरीज सामान्य रूप से बातचीत कर रहा है, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ ले पा रहा है, उसका ब्लड प्रेशर स्थिर है और शरीर के किसी भी हिस्से से खून का स्राव नहीं हो रहा है, तो केवल 40 हजार काउंट देखकर घबराने या आनन-फानन में प्लेटलेट चढ़वाने की होड़ में शामिल होने की कतई जरूरत नहीं है।
इन ‘रेड फ्लैग’ लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
प्लेटलेट काउंट चाहे जो भी हो, अगर मरीज में कुछ खास किस्म के गंभीर लक्षण उभरते हैं तो बिना वक्त गंवाए विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। यदि नाक या मसूड़ों से खून आ रहा हो, उल्टी या मल का रंग काला या खूनी हो, पेट में असहनीय दर्द हो, लगातार जी मिचला रहा हो, बहुत ज्यादा बेचैनी महसूस हो रही हो या पेशाब आना कम हो गया हो, तो ये स्थितियां शरीर में अंदरूनी ब्लीडिंग और प्लाज्मा लीकेज का संकेत देती हैं। ऐसे मामलों में तत्काल डॉक्टरी देखभाल और अस्पताल में भर्ती होना अनिवार्य हो जाता है।
इलाज का असली मंत्र: हाइड्रेशन और सही दवाओं का चयन
डेंगू का कोई सीधा एंटीवायरल इलाज नहीं है, इसलिए इसका पूरा प्रबंधन ‘सपोर्टिव केयर’ पर टिका होता है। सबसे अहम बात है कि मरीज के शरीर में पानी की रत्ती भर भी कमी न होने दी जाए। ओआरएस (ORS), नारियल पानी, नींबू पानी और पतली छाछ जैसे तरल पदार्थ मरीज को लगातार दिए जाने चाहिए। अगर उल्टी के कारण मरीज मुंह से कुछ नहीं ले पा रहा है, तो अस्पताल में आईवी ड्रिप (IV Fluids) के जरिए तरल पदार्थ दिए जाते हैं। बुखार और शरीर दर्द से राहत के लिए सिर्फ पैरासिटामोल ही सुरक्षित मानी जाती है। पेनकिलर जैसे एस्पिरिन या आइबुप्रोफेन का सेवन खुद से भूलकर भी न करें, क्योंकि ये दवाएं रक्त को पतला कर ब्लीडिंग के खतरे को कई गुना बढ़ा देती हैं।
घरेलू नुस्खे और प्लेटलेट चढ़ाने का सच
घर-घर में प्रचलित पपीते के पत्तों के रस या गिलोय के काढ़े को लेकर डॉक्टरों का रुख व्यावहारिक है। कुछ शुरुआती अध्ययनों में भले ही इनके लाभ का जिक्र हो, लेकिन यह कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल प्रोटोकॉल नहीं है। कई बार पपीते के कड़वे रस से मरीजों को तेज उल्टी होने लगती है, जिससे शरीर का डिहाइड्रेशन और बिगड़ जाता है। वहीं, प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन का फैसला केवल आंकड़े देखकर नहीं, बल्कि मरीज की क्लिनिकल स्थिति और एक्टिव ब्लीडिंग को देखकर ही लिया जाता है। इसलिए रिपोर्ट देखकर पैनिक बटन दबाने के बजाय डॉक्टर की सतत निगरानी में रहना ही समझदारी है।
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