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Dowry Deaths In India: 'लोग क्या कहेंगे' के डर ने ली एक और बेटी की जान, जानिए दहेज प्रताड़ना पर क्या कहते हैं सामाजिक एक्सपर्ट्स

GGaganpreet Kaur
'लोग क्या कहेंगे' के डर ने ली एक और बेटी की जान, जानिए दहेज प्रताड़ना पर क्या कहते हैं सामाजिक एक्सपर्ट्स
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इन दिनों मीडिया से लेकर सोशल मीडिया के गलियारों तक नोएडा की ट्विशा शर्मा का मामला पूरी तरह छाया हुआ है। हर रोज नए खुलासे हो रहे हैं, पुलिस की तफ्तीश आगे बढ़ रही है, बयानों के तीर चल रहे हैं और जनता का गुस्सा चरम पर है। लोग आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन सब हंगामों के बीच एक कड़वा और चुभता हुआ सवाल वहीं का वहीं खड़ा है—वह बेटी जो अपनी आंखों में सुनहरे सपने और उम्मीदें संजोकर पांच महीने पहले दुल्हन बनी थी, क्या अब किसी अदालती बहस या सोशल मीडिया कैंपेन से लौट सकती है?

ट्विशा ने अपनी तकलीफ को कभी राज नहीं रखा था। उसने फोन पर रोते हुए अपनी मां से घर वापस ले जाने की मिन्नतें की थीं, अपने भाई से घुटती हुई जिंदगी का दर्द साझा किया था और सहेली को भी अपनी आपबीती बताई थी। लेकिन हमारे समाज की त्रासदी देखिए, यहाँ अक्सर बेटियों की चीखें सुन तो ली जाती हैं, मगर उन्हें गंभीरता से समझा नहीं जाता। इस मामले में दहेज उत्पीड़न का कोण पुलिस की जांच के केंद्र में है।

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सिलसिलेवार मौतें और समाज की खामोशी: दीपिका से लेकर पलक तक की दर्दनाक दास्तान

अभी लोग ट्विशा के गम से उबर भी नहीं पाए थे कि ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की मौत की खबर ने सबको भीतर तक झकझोर कर रख दिया। गांव की सबसे होनहार और खूबसूरत लड़कियों में शुमार होने वाली दीपिका की जिंदगी को कथित तौर पर बड़ी गाड़ी और नकदी की अंतहीन मांग ने निगल लिया। उसने भी मरने से पहले अपने मायके वालों को ससुराल में हो रहे जुल्मों की दास्तान सुनाई थी। इसी बीच, ग्वालियर से आई पलक रजक की संदिग्ध मौत ने इस सामाजिक कोढ़ पर एक और गहरा सवालिया निशान लगा दिया है। पलक की शादी को अभी साल भर भी नहीं बीता था कि उसके मायके वालों को उसकी लाश देखनी पड़ी। परिजनों का सीधा आरोप है कि दहेज के लालची भेड़ियों ने उनकी बेटी को मार डाला।

“नाम बदल जाते हैं, तारीखें बदल जाती हैं, लेकिन अखबार के पन्नों पर छपने वाला यह खौफनाक दर्द कभी नहीं बदलता। 21वीं सदी की आत्मनिर्भर, पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा महिलाएं भी इस मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के चक्रव्यूह से खुद को आजाद नहीं कर पा रही हैं।”

आंकड़े जो रीढ़ में सिहरन पैदा कर दें: NCRB की रिपोर्ट का खौफनाक सच

दहेज हत्याओं के आधिकारिक आंकड़े इतने डरावने हैं कि किसी भी संवेदनशील इंसान का कलेजा कांप उठे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में 5,737 महिलाओं को दहेज की वेदी पर चढ़ा दिया गया। भौगोलिक नजरिए से देखें तो उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे बदनाम राज्य बनकर उभरा है, जहाँ एक साल में 2,038 बेटियों की डोली अर्थी में बदल गई। पड़ोसी राज्य बिहार 1,078 मौतों के साथ दूसरे पायदान पर है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में 450, राजस्थान में 386, पश्चिम बंगाल में 337, झारखंड में 206, ओडिशा में 200 और हरियाणा में 177 महिलाओं ने दहेज के लोभियों के कारण दम तोड़ा। हैरान करने वाली बात यह है कि देश की हाई-टेक राजधानी दिल्ली भी इस कलंक से अछूती नहीं है, जहाँ साल 2024 में 109 दहेज हत्याएं दर्ज की गईं।

‘रिश्ता’ नहीं, अब ‘इवेंट’ बन चुकी है शादी: विशेषज्ञों की पैनी नजर

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुनीत मुखर्जी इस मौजूदा सामाजिक ढांचे पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं। उनका साफ कहना है कि ये आंकड़े केवल कागजी संख्या नहीं हैं, बल्कि यह हमारे सामूहिक सामाजिक पतन का आईना हैं। डॉ. मुखर्जी के अनुसार, “आज की लड़कियां पढ़-लिख रही हैं, खुद कमा रही हैं, इसके बावजूद अगर वे ससुराल में सुरक्षित नहीं हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि खराबी कानून में नहीं बल्कि हमारी सड़ी-गली मानसिकता में है। हमने शादी जैसे पवित्र बंधन को एक शुद्ध व्यावसायिक ‘इवेंट’ बना दिया है, जहाँ आपसी तालमेल और सम्मान से ज्यादा चर्चा इस बात पर होती है कि किसने कितना खर्च किया, कौन सी गाड़ी दी और गहने कितने तोले के थे।”

“लोग क्या कहेंगे” का वो जानलेवा डर, जो बेटियों के मायके के दरवाजे बंद कर देता है

दहेज प्रताड़ना की शिकार कोई भी लड़की अचानक या एक दिन में आत्मघाती कदम नहीं उठाती। वह टूटने से पहले लगातार खतरे के संकेत देती है। वह मायके फोन करके सिसकती है, अपने डर और तनाव को बयां करती है। लेकिन अक्सर लड़कियों के माता-पिता समाज के कथित ठेकेदारों के डर, रिश्तेदारों के तानों और “लोग क्या कहेंगे” के आत्मघाती जाल में उलझ जाते हैं। बेटियों को बचपन से ‘जीना’ नहीं, बल्कि ‘हर हाल में शादी बचाना’ और ‘ससुराल से सिर्फ अर्थी पर निकलना’ जैसी रूढ़िवादी बातें सिखाई जाती हैं।

इस विषय पर साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ आर्ट्स एंड डिजाइन से जुड़े प्रोफेसर डॉ. अंबरीष सक्सेना का मानना है कि जब तक हम अपनी बेटियों को समझौता करने के बजाय डटकर मुकाबला करने का हौसला नहीं देंगे और मायके के दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले नहीं रखेंगे, तब तक कानून की कोई भी धारा इन मासूमों को मौत के फंदे पर झूलने से नहीं रोक पाएगी।

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