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Gen Z Lifestyle: अमीर पैरेंट्स बना रहे हैं अपनी Gen Z औलादों को बेरोजगार? X पर वायरल पोस्ट ने मचाया घमासान

AAmandeep Singh
Gen Z Lifestyle: अमीर पैरेंट्स बना रहे हैं अपनी Gen Z औलादों को बेरोजगार? X पर वायरल पोस्ट ने मचाया घमासान

अमीर पैरेंट्स बना रहे हैं अपनी Gen Z औलादों को बेरोजगार? X पर वायरल पोस्ट ने मचाया घमासान

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Gen Z Lifestyle: सपनों को साकार करने और शून्य से शुरुआत करने वाली भारत की पारंपरिक छवि के बीच एक नया सामाजिक विरोधाभास खड़ा हो गया है। वैल्यू इन्वेस्टर और वित्तीय सलाहकार प्रेम सोनी द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए विचारों ने अमीर परिवारों के परवरिश के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका दावा है कि अत्यधिक संपत्ति, पैसिव इनकम और पारिवारिक सुरक्षा के जाल में उलझकर भारत के अमीर परिवारों के युवा (Gen Z) अपनी संघर्ष करने की क्षमता खो रहे हैं।

तीन ट्रैप में उलझे अमीर परिवारों के Gen Z युवा

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वायरल पोस्ट में टियर-1 और टियर-2 शहरों के करीब 25 साल के युवाओं के व्यवहार का विश्लेषण करते हुए तीन मुख्य मानसिक जालों (Traps) का जिक्र किया गया है:

ईगो ट्रैप (अहंकार का सामाजिक जाल): अपनी सामाजिक हैसियत के कारण ये युवा ग्राउंड-लेवल, सेल्स या किसी भी शुरुआती स्तर की नौकरी को अपनी शान के खिलाफ मानते हैं।

लाइफस्टाइल ट्रैप (खर्चों का जाल): कॉर्पोरेट जगत में मिलने वाली ₹30,000 की शुरुआती मासिक तनख्वाह उनके लिए ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती है। कैफे कल्चर, वीकेंड ट्रिप्स और महंगी गाड़ियों के पेट्रोल का खर्च जब माता-पिता उठा रहे हों, तो इतनी सैलरी उन्हें छोटी लगती है।

एंटाइटेलमेंट ट्रैप (अधिकार और आराम का जाल): ये युवा अपने पारंपरिक पारिवारिक बिजनेस को संभालने से भी बचते हैं, क्योंकि उन्हें वह काम ‘बोरिंग’ या अपनी मॉडर्न लाइफस्टाइल के मुफीद नहीं लगता।

भारतीय बनाम अमेरिकी परवरिश: क्या आराम घोंट रहा है हुनर?

सोनी के मुताबिक, इस रवैये के पीछे सिर्फ बच्चों की गलती नहीं बल्कि माता-पिता की मानसिकता भी जिम्मेदार है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में बच्चों को 18 की उम्र के बाद स्वतंत्र होने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए बाहर धकेला जाता है, जबकि भारत में ‘जब पिता कमा रहा है तो बाहर भटकने की क्या जरूरत’ वाली सोच हावी रहती है। वित्तीय सुरक्षा की यह चादर युवाओं से उनकी भूख, सर्वाइवल स्किल्स और नया रचने (Innovation) का जज्बा छीन रही है।

सोशल मीडिया पर बंटे विचार: आराम सही या संघर्ष?

इस पोस्ट ने इंटरनेट पर दो वैचारिक गुट बना दिए हैं। एक वर्ग का तर्क है कि यदि परिवार के पास सैकड़ों करोड़ की संपत्ति है, तो कॉर्पोरेट राजनीति और दफ्तरी झंझटों में पड़ने के बजाय जीवन का आनंद लेना और रचनात्मक काम करना कोई गुनाह नहीं है। वहीं, दूसरे बड़े वर्ग का कहना है कि विरासत में मिली संपत्ति से आराम तो खरीदा जा सकता है, लेकिन आत्म-संतुष्टि और सम्मान केवल अपनी मेहनत से ही हासिल होता है।

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