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Gurugram Modern Poverty: 40 लाख का पैकेज और BMW कार, फिर भी खुद को गरीब मानकर रात भर नहीं सो पाता यह शख्स

AAmandeep Singh
Gurugram Modern Poverty: 40 लाख का पैकेज और BMW कार, फिर भी खुद को गरीब मानकर रात भर नहीं सो पाता यह शख्स
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गुरुग्राम। दिल्ली से सटे हाईटेक शहर गुरुग्राम की ऊंची इमारतें और करोड़ों के कॉर्पोरेट पैकेज अक्सर बाहर से बेहद सुहावने लगते हैं, लेकिन इस चकाचौंध के भीतर एक ऐसा मानसिक संकट पैर पसार रहा है जिसकी कल्पना भी डरावनी है। हाल ही में डॉ. सनी गर्ग के क्लिनिक में एक ऐसा मरीज पहुंचा, जिसकी शारीरिक बीमारी से ज्यादा उसकी मानसिक उलझन ने डॉक्टर को सोचने पर मजबूर कर दिया। वह शख्स कोई आम कामकाजी नहीं, बल्कि महीने के करीब सवा तीन लाख रुपये से ज्यादा कमाने वाला और चमचमाती बीएमडब्ल्यू कार से चलने वाला एक रसूखदार प्रोफेशनल था। डॉक्टर के सामने बैठते ही उसने बेहद संजीदगी से कहा, “डॉक्टर, मुझे लगता है कि मैं बहुत गरीब हूं और इसी घबराहट में मुझे रात भर नींद नहीं आती।”

बदल गया है तुलना का पैमाना

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डॉ. गर्ग ने जब इस मानसिक स्थिति की गहराई से पड़ताल की, तो भारतीय मध्य और उच्च-मध्यम वर्ग का एक डरावना चेहरा सामने आया। आर्थिक पैमाने पर जो व्यक्ति देश के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों में गिना जाना चाहिए, वह अवसाद की कगार पर है। इसकी वजह यह है कि अब हमारे समाज में तरक्की को नापने का ‘रेफरेंस पॉइंट’ यानी पैमाना पूरी तरह बदल चुका है।

पहले के दौर में इंसान अपनी कामयाबी की तुलना अपने मोहल्ले, रिश्तेदारों या सहकर्मियों से करता था। लेकिन आज की सोशल मीडिया जनरेशन सुबह उठते ही इंस्टाग्राम या लिंक्डइन (LinkedIn) पर किसी ऐसे 28 साल के युवा की प्रोफाइल देखती है जिसने अपना स्टार्टअप करोड़ों में बेच दिया हो। इस वर्चुअल दुनिया की तुलना ने जमीन पर रहने वाले इंसान के भीतर एक गहरा खालीपन पैदा कर दिया है। इसे ही डॉक्टर ने ‘मॉडर्न पॉवर्टी’ का नाम दिया है, जहां बैंक बैलेंस तो बढ़ता है, लेकिन संतुष्टि का ग्राफ शून्य से नीचे चला जाता है।

डॉक्टर के वो सवाल, जिन्होंने झकझोर दिया

मरीज की इस अंधी दौड़ को थामने के लिए डॉक्टर ने उससे कुछ बेहद तीखे और बुनियादी सवाल पूछे। डॉक्टर ने पूछा, “पिछले एक साल में क्या एक बार भी तुमने खुद से कहा कि मेरे पास जो है, वो मेरे लिए काफी है?” मरीज का जवाब था, “कभी नहीं।” जब डॉक्टर ने अगला सवाल दागा कि “आखिर तुम यह दिन-रात की दौड़ किसके लिए और क्यों लगा रहे हो?”, तो उस प्रोफेशनल के पास कोई जवाब नहीं था। उसने बस इतना स्वीकार किया कि वह इस भेड़चाल में इसलिए दौड़ रहा है क्योंकि उसके आसपास के सभी लोग इसी रेस का हिस्सा हैं।

पैसा कमाने का औजार बन चुकी है जिंदगी

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि आज की पूरी युवा पीढ़ी का आईना है। डॉ. गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि जब जीवन की हर खुशी, रिश्ते और कामयाबी का पैमाना सिर्फ और सिर्फ पैसा बन जाता है, तो इंसान धीरे-धीरे एक भावनाहीन मशीन में तब्दील होने लगता है। बैंक खातों में जमा अंकों की बड़ी संख्या कभी भी अकेलेपन और जीवन के असली उद्देश्य की कमी को पूरा नहीं कर सकती। यह वाकया गवाही देता है कि अगर आपके पास मानसिक शांति और संतोष नहीं है, तो बीएमडब्ल्यू की सवारी भी आपको तंगहाली का ही अहसास कराएगी।

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