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LPG Cylinder Crisis Hansi: 'महाराज' बना गैस सिलेंडर! हफ़्तों के इंतज़ार के बाद मिला तो मोहल्ले वालों ने मनाया जश्न

AAmandeep Singh
'महाराज' बना गैस सिलेंडर! हफ़्तों के इंतज़ार के बाद मिला तो मोहल्ले वालों ने मनाया जश्न
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हांसी। हरियाणा के हांसी में इन दिनों रसोई गैस सिलेंडर किसी बेशकीमती वस्तु से कम नहीं रह गया है। शहर में जारी गैस की भारी किल्लत ने आम आदमी के सब्र का बांध तोड़ दिया है। सोमवार को जगदीश कॉलोनी में विरोध का एक ऐसा मानवीय और व्यंग्यात्मक चेहरा सामने आया, जिसने सोशल मीडिया से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक चर्चा छेड़ दी है। यहाँ एक परिवार ने सिलेंडर मिलने की खुशी को किसी बड़े त्योहार की तरह मनाया, क्योंकि उनके लिए चूल्हा जलना अब किसी चुनौती से कम नहीं रहा।

जब घर आए ‘सिलेंडर महाराज’

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कॉलोनी निवासी सचिन जब करीब एक सप्ताह की भाग-दौड़ और लंबी लाइनों में लगने के बाद साइकिल पर सिलेंडर लेकर घर पहुंचे, तो उनकी पत्नी खुशबू ने दरवाजे पर ही उनका तिलक लगाकर स्वागत किया। सिलेंडर को बाकायदा माला पहनाई गई और उसे ‘महाराज’ कहकर पुकारा गया। सचिन ने बताया कि सिलेंडर का घर पहुंचना अब किसी जंग जीतने जैसा अहसास दे रहा है। देखते ही देखते आसपास के पड़ोसी भी इकट्ठा हो गए और सभी ने एक सुर में वर्तमान सप्लाई व्यवस्था के प्रति अपना गुस्सा जाहिर किया।

युद्ध की तपिश और रसोई का संकट

दरअसल, वैश्विक पटल पर अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के तनाव ने भारत की गैस सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर हरियाणा के कस्बों और शहरों में देखने को मिल रहा है। घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ कमर्शियल सिलेंडर के लिए भी मारामारी मची है। पड़ोसी राजेंद्र सोरखी ने बताया कि लोग सुबह से शाम तक गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। होटल और ढाबा संचालक भी कोयले और लकड़ी के पुराने दौर में लौटने को मजबूर हैं।

‘खाने के लाले पड़ गए हैं’

सचिन की पत्नी खुशबू का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने कहा, “पिछले एक हफ्ते से रसोई का बजट और खाना बनाने का तरीका दोनों बिगड़ चुके हैं। बड़ी मुश्किल से यह सिलेंडर नसीब हुआ है, इसीलिए इसका स्वागत किया ताकि सरकार को हमारी तकलीफ समझ आए।” स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन को युद्ध जैसे अंतरराष्ट्रीय कारणों का हवाला देने के बजाय स्थानीय स्तर पर बफर स्टॉक और वितरण प्रणाली को दुरुस्त करना चाहिए ताकि आम आदमी को मूलभूत जरूरतों के लिए सड़कों पर तमाशा न करना पड़े।

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