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Health Tips: मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बन रहा है सर्वाइकल का कारण, कम उम्र में कमजोर हो रहा स्पाइन

GGaganpreet Kaur
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Health Tips: मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बन रहा है सर्वाइकल का कारण, कम उम्र में कमजोर हो रहा स्पाइन

मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बन रहा है सर्वाइकल का कारण, कम उम्र में कमजोर हो रहा स्पाइन

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Health Tips: हमारे शरीर का पूरा ढांचा और संतुलन काफी हद तक रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइन पर टिका होता है। मस्तिष्क से लेकर नितंब तक फैली यह खांचेदार हड्डियां कई महत्वपूर्ण भागों में बंटी होती हैं। गर्दन वाले हिस्से को सर्वाइकल स्पाइन कहा जाता है, जिसमें 7 हड्डियां आपस में जुड़ी होती हैं। इसके बाद पसलियों तक थोरोसिक स्पाइन (12 हड्डियां), नीचे लंबर स्पाइन (5 हड्डियां) और फिर सेक्रम तथा कॉक्सिक्स (टेलबोन) होती हैं। इन हड्डियों के बीच एक प्राकृतिक पाइप जैसी जगह होती है, जिससे ब्रेन से निकलने वाली सभी मुख्य नसें गुजरती हैं और पूरे शरीर में तंत्रिकाओं का जाल फैलाती हैं।

स्पाइन का हमारे शरीर में क्या है महत्व?

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स्पाइन का काम केवल शरीर का भार उठाना ही नहीं है, बल्कि यह तंत्रिकाओं के जरिए मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान का मुख्य मार्ग भी है। लेकिन विडंबना यह है कि आज की तेज-तर्रार और तकनीक पर आधारित जीवनशैली में 20 से 30 साल के युवा भी समय से पहले स्पाइन की कमजोरी से जूझ रहे हैं। कम उम्र में ही शरीर में दर्द, जकड़न और गंभीर परेशानियां इस तरह घर करने लगी हैं कि जिंदगी मुश्किल लगने लगती है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें जिम्मेदार हैं— ‘टेक नेक’ (Tech Neck) और ‘सिटिंग एपिडेमिक’ (Sitting Epidemic)।

स्मार्टफोन बनता जा रहा है सर्वाइकल की बड़ी वजह

जाने-माने विशेषज्ञों और डॉक्टर भुवना आहूजा के अनुसार, ‘टेक नेक’ का सीधा मतलब तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल से गर्दन को होने वाली क्षति से है। जब हम किसी भी दबाव के बिना सहज भाव से गर्दन सीधी रखते हैं, तो सिर का प्राकृतिक वजन लगभग साढ़े 4 से साढ़े 5 किलोग्राम होता है और गर्दन लगभग 0 डिग्री पर होती है। लेकिन, जैसे ही हम फोन देखने या किसी अन्य काम के लिए गर्दन को 60 डिग्री के कोण पर झुकाते हैं, तो रीढ़ पर अचानक 27 किलोग्राम का अतिरिक्त वजन और दबाव बढ़ जाता है।

मांसपेशियों और नसों पर पड़ता है अत्यधिक दबाव

जब गर्दन पर लगातार 27 किलो का यह भारी दबाव पड़ता रहता है, तो इससे ‘रिपीटिटिव स्ट्रेन सिंड्रोम’ की समस्या पैदा हो जाती है। इस अत्यधिक बायोमेकेनिकल लोड के कारण गर्दन की मांसपेशियों, टेंडन्स और लिगामेंट्स में बारीक खिंचाव (माइक्रो-ट्रॉमा) और क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन होने लगता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो ‘सर्वाइकल लॉर्डोसिस’ जैसी गंभीर बीमारी हो जाती है, जिसमें गर्दन की हड्डियों का स्वाभाविक ‘सी’ (C) आकार का कर्व सीधा होने लगता है। इसके चलते हड्डियां और टेंडन अपनी जगह से खिसकने लगती हैं, नसों पर दबाव बढ़ता है और कम उम्र में ही डिस्क डिजनरेशन या न्यूरोलॉजिकल समस्याएं घेर लेती हैं। स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने वाला शायद ही कोई युवा हो जो इस अनजाने खतरे से बच पा रहा हो।

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