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हरियाणा विधानसभा में आदित्य सुरजेवाला ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर भाजपा सरकार पर साधा निशाना

VVinita Kohli
हरियाणा विधानसभा में आदित्य सुरजेवाला ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर भाजपा सरकार पर साधा निशाना
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कैथल: हरियाणा विधानसभा में आज कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला ने ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा के दौरान एक ओजस्वी और भावुक भाषण दिया। उन्होंने राष्ट्रगीत की पंक्तियों को भारत माँ की संज्ञा देते हुए पर्यावरणीय संकट से जोड़ा और सरकार से सवाल उठाए कि क्या प्रदूषित पानी, हवा और भूमि के बीच ‘वंदे मातरम्’ का सच्चा सम्मान हो रहा है? सुरजेवाला ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा कि वंदे मातरम् यानी भारत माँ को नमन। लेकिन आज हम जिस पर्यावरणीय आपदा का सामना कर रहे हैं, क्या यही माँ का सम्मान है? उन्होंने ‘सुजलाम् सुफलाम्’ की पंक्ति उद्धृत करते हुए बताया कि आज पानी में लेड, यूरेनियम, फ्लोराइड और टॉक्सिक केमिकल्स मिल रहे हैं। 

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रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए उन्होंने पूछा कि दूषित पानी पीने से माँओं के दूध में भी यूरेनियम पहुंच रहा है। “जिस माँ के दूध को जहर बना दिया, उसे प्रणाम करने का नैतिक अधिकार किसे है? ‘श्यामलाम्’ पंक्ति पर बोलते हुए विधायक आदित्य सुरजेवाला ने अरावली पहाड़ियों के डी-क्लासिफिकेशन, अवैध खनन को वैध बनाने और जंगलों की कटाई पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि धरती माँ की हड्डियां तोड़ दीं और ऊपर से वंदे मातरम् अनिवार्य बताते हैं। चंडीगढ़ में AQI 340 का जिक्र करते हुए उन्होंने हवा को ‘गैस चैंबर’ करार दिया और ‘मलयज शीतलाम्’ की पंक्ति से तुलना की। क्या हम माँ को प्रणाम कर रहे हैं या धीरे-धीरे साँस घोंट रहे हैं? सुरजेवाला ने स्पष्ट किया कि यह बहस राजनीति की नहीं, मानवता और आने वाली पीढ़ियों की है। 

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नदियां, जंगल और हवा नहीं बचाए गए तो प्रकृति किताबों का अध्याय बन जाएगी। सुरजेवाला ने भाजपा के चिह्न कमल के फूल का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कमल का फूल ही नहीं बचे तो आपकी पार्टी भी विलुप्त हो जाएगी, फिर न नारा बचेगा, न प्रतीक, न प्रकृति। उन्होंने सरकार से अपील की कि वंदे मातरम् को विभाजन का हथियार मत बनाइए। यदि सच में सम्मान है तो नदियां, जंगल, हवा बचाइए। वंदे मातरम् बोलना आसान है,जीना मुश्किल।” आदित्य सुरजेवाला ने भाषण का समापन ‘जय हरियाणा, जय भारत, वंदे मातरम्’ से किया। विधायक के इस भाषण ने सदन में गहरी छाप छोड़ी और पर्यावरण संरक्षण पर गंभीर बहस की मांग उठी है।

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