Jyeshtha Purnima: क्यों खास है इस बार की ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा? जानिए शुभ मुहूर्त, स्नान-दान का नियम और धार्मिक महत्व

GGaganpreet Kaur
क्यों खास है इस बार की ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा? जानिए शुभ मुहूर्त, स्नान-दान का नियम और धार्मिक महत्व
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 देश में धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों का ताना-बाना इतना मजबूत है कि हर त्योहार एक नए उत्साह का संचार करता है। इसी कड़ी में, रविवार को ज्येष्ठ मास के अधिकमास की पूर्णिमा बेहद श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाई जाएगी। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, अधिकमास की इस पूर्णिमा को अत्यंत पुण्यदायी और पापों का नाश करने वाला माना गया है। यही वजह है कि सुबह के ब्रह्म मुहूर्त से ही देश के प्रमुख मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद लेने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगेगा।

इस विशेष दिन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए वैदिक आचार्य अनिल परासर ने बताया कि अधिकमास को शास्त्रों में ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहा गया है, जो पूरी तरह से भगवान नारायण को समर्पित है। हर तीन साल में आने के कारण इस महीने की पूर्णिमा का आध्यात्मिक मूल्य सामान्य पूर्णिमा की तुलना में कई गुना बढ़ जाता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से व्रत रखता है, मंत्रों का जाप करता है और श्रीहरि का पूजन करता है, उसके जीवन की सभी आर्थिक और मानसिक परेशानियां दूर हो जाती हैं।

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गंगा स्नान और घर पर पूजा का क्या है विधान?

आचार्य परासर के मुताबिक, पूर्णिमा के दिन सुबह सवेरे उठकर पवित्र नदियों में डुबकी लगाने का बड़ा महत्व है। यदि संभव हो, तो श्रद्धालुओं को गंगा, यमुना या सरस्वती जैसी पवित्र नदियों के घाटों पर जाकर स्नान करना चाहिए। हालांकि, जो लोग किसी कारणवश तीर्थ स्थलों पर नहीं जा सकते, वे घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाकर विधि-विधान से पूजा की शुरुआत करनी चाहिए।

दान-पुण्य से चमकेगी किस्मत, कई गुना मिलता है फल

शास्त्रों में इस दिन को लेकर दान की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है। अधिकमास की पूर्णिमा पर किए गए नेक कार्यों का फल कभी नष्ट नहीं होता। आचार्य परासर ने बताया कि इस दिन गरीबों और जरूरतमंद लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल, जल से भरे घड़े या छाते का दान करना चाहिए। गर्मी के मौसम को देखते हुए पानी के प्याऊ लगवाना या राहगीरों को ठंडा जल पिलाना भी महादान की श्रेणी में आता है। इसके अलावा, घर की सुख-शांति के लिए इस दिन विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत कथा का पाठ करना बेहद मंगलकारी माना गया है।

मन की शुद्धता और नकारात्मकता से दूरी है असली भक्ति

धर्म केवल बाहरी कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंतरिक सुधार का भी माध्यम है। आचार्य ने श्रद्धालुओं को नसीहत दी है कि पूर्णिमा के पावन अवसर पर इंसान को अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और नकारात्मक विचारों का त्याग करना चाहिए। किसी की निंदा करने से बचना और पूरी तरह ईश्वर की भक्ति में लीन रहना ही सच्ची सेवा है। इस दिन की गई निश्छल भक्ति से व्यक्ति के जाने-अनजाने में हुए पापों का क्षय होता है। यही कारण है कि देश भर के श्रद्धालु इस रविवार को स्नान, ध्यान और दान के माध्यम से अक्षय पुण्य कमाने की तैयारी में जुटे हैं।

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