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Kaithal Haryana Roadways: कैथल डिपो में बसों का टोटा: शाम ढलते ही दिल्ली, चंडीगढ़ और हिसार का रूट बंद, निजी वाहन चालक कर रहे मनमानी वसूली

GGaganpreet Kaur
कैथल डिपो में बसों का टोटा: शाम ढलते ही दिल्ली, चंडीगढ़ और हिसार का रूट बंद, निजी वाहन चालक कर रहे मनमानी वसूली
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कैथल। प्रदूषण कम करना है और ईंधन बचाना है, तो निजी गाड़ियों को छोड़िए और सार्वजनिक परिवहन (पब्लिक ट्रांसपोर्ट) का इस्तेमाल कीजिए।” देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर मंचों से देशवासियों से यह अपील करते नजर आते हैं। सुनने में यह बात जितनी अच्छी और व्यावहारिक लगती है, जमीनी धरातल पर उतनी ही खोखली साबित हो रही है। कम से कम हरियाणा के कैथल जिले के हालात तो यही तस्दीक कर रहे हैं। यहाँ का आम नागरिक चाहकर भी प्रधानमंत्री की इस नसीहत पर अमल नहीं कर पा रहा है, क्योंकि जब वह घर से बाहर निकलता है, तो उसे स्टेशन पर रोडवेज की बसें ही नहीं मिलतीं। कैथल डिपो में बसों की भारी किल्लत के चलते अब आम जनता के सब्र का बांध टूटने लगा है।

मांग 250 की, बेड़े में सिर्फ 156 बसें; आधी से ज्यादा खटारा होने की कगार पर

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कैथल रोडवेज डिपो के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जिले के सभी ग्रामीण और शहरी रूटों पर सुचारू रूप से बस सेवा संचालित करने के लिए डिपो को कम से कम 250 से अधिक बसों के बेड़े की दरकार है। इसके विपरीत, वर्तमान में डिपो के पास केवल 156 बसें ही ऑन-पेपर उपलब्ध हैं। यानी सीधे तौर पर 94 बसों की कमी से पूरा जिला जूझ रहा है। कोढ़ में खाज यह कि इन 156 बसों में से भी लगभग 90 बसें ‘बीएस-3’ (BS-III) मॉडल की हैं, जो अपनी समय सीमा पूरी कर बेहद जर्जर हो चुकी हैं। ये खटारा बसें अक्सर बीच रास्ते में ही हांफ जाती हैं और यात्रियों को बीच सफर में ही उतारकर वर्कशॉप की राह पकड़ लेती हैं।

गणित ऐसा जो घाटे का सौदा बना: 25 नई बसें आईं, तो 65 कबाड़ में तब्दील हो गईं

रोडवेज के बेड़े को आधुनिक और बड़ा बनाने के सरकारी दावे कैथल में आकर कैसे दम तोड़ देते हैं, इसका अंदाजा पिछले एक साल के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। बीते एक वर्ष के दौरान परिवहन विभाग ने कैथल डिपो को करीब 25 नई बसें तो आवंटित कीं, लेकिन इसी समयावधि में 65 बसें अपनी मियाद पूरी कर जर्जर हो गईं और उन्हें कबाड़ घोषित कर बेड़े से बाहर करना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि डिपो का नेट ग्राफ बढ़ने की बजाय और नीचे गिर गया।

इसका सीधा खामियाजा मुख्य मार्गों से दूर बसे ग्रामीण अंचलों को भुगतना पड़ रहा है। जिले के लगभग 60 गांव ऐसे हैं, जहां दोपहर के समय रोडवेज की एक भी बस नहीं फटकती। यहाँ केवल सुबह कर्मचारियों और स्कूली बच्चों के लिए और शाम को उनकी वापसी के लिए ही बसें भेजी जा रही हैं।

शाम ढलते ही थम जाते हैं पहिए; दिल्ली-चंडीगढ़ के लिए तरसते हैं मुसाफिर

रोडवेज की इस बदइंतजामी की मार सिर्फ ग्रामीणों पर ही नहीं, बल्कि लंबे रूट के यात्रियों पर भी पड़ रही है। यदि आपको शाम के समय कैथल से दिल्ली, चंडीगढ़, हिसार या राजस्थान के बीकानेर के लिए सफर करना हो, तो आपको बस अड्डे पर केवल सन्नाटा ही मिलेगा। शाम के वक्त इन रूटों पर बसों का संचालन न के बराबर है।

ऐसी मजबूरी में मुसाफिरों को अपनी जेब ढीली कर निजी वाहनों, अवैध टैक्सियों या डग्गामार गाड़ियों का सहारा लेना पड़ता है। निजी वाहन चालक भी मुसाफिरों की इस लाचारी का पूरा फायदा उठाते हैं और उनसे दोगुना-तिगुना किराया वसूलते हैं। कई बार तो कड़कड़ाती धूप या देर रात को सवारियों को दो-दो घंटे तक किसी निजी साधन के लिए भी सड़कों पर भटकना पड़ता है। ऐसे में जनता का प्रशासन से सीधा सवाल है कि बिना पर्याप्त साधनों के डिजिटल और ग्रीन इंडिया के दावों को अमलीजामा कैसे पहनाया जाएगा?

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