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Kaithal News: 2017 के कोटड़ा पुलिस हमला केस में बड़ा फैसला, सभी 27 आरोपी बरी

GGaganpreet Kaur
Kaithal News: 2017 के कोटड़ा पुलिस हमला केस में बड़ा फैसला, सभी 27 आरोपी बरी

2017 के कोटड़ा पुलिस हमला केस में बड़ा फैसला

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Kaithal News: कैथल जिले के बहुचर्चित कोटड़ा पुलिस हमला और उपद्रव मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सत्र न्यायाधीश कंचन माही की अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों को नाकाफी मानते हुए मामले के सभी 27 आरोपियों को बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से 26 आरोपियों की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता हरपाल सिंह दूहन और एक आरोपी की पैरवी अधिवक्ता सुरेश मान ने की। अदालत ने अपने फैसले में माना कि पुलिस की ओर से पेश किए गए गवाह और साक्ष्य आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे।

क्या था पूरा मामला?

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पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के मुताबिक, यह घटना 25 अगस्त 2017 की है जब डेरा सच्चा सौदा प्रमुख से जुड़े अदालती फैसले के बाद तनाव का माहौल था। राजौंद पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि गांव कोटड़ा स्थित डेरे पर डेरा अनुयायी बड़ी संख्या में जमा हैं। आरोप था कि 60 से 70 लोग मोटरसाइकिलों पर सवार होकर हाथों में लाठी-डंडे, गंडासे, तलवारें और पेट्रोल की बोतलें लेकर पहुंचे थे। सूचना मिलते ही एएसआई सुभाष चंद्र के नेतृत्व में पुलिस बल मौके पर पहुंचा था, जहां उग्र भीड़ ने पुलिस टीम पर कथित तौर पर धावा बोल दिया था।

फायरिंग, आगजनी और पुलिसकर्मियों के घायल होने का था आरोप

अभियोजन पक्ष का दावा था कि भीड़ ने पुलिस वाहनों पर पेट्रोल की बोतलें फेंकी और सीधी फायरिंग की। इस हिंसक झड़प में ईएएसआई सुरजीत सिंह और जसबीर सिंह समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। हालात पर काबू पाने के लिए ड्यूटी मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े थे और लाठीचार्ज करना पड़ा था। आरोप यह भी था कि इसके बाद उपद्रवियों ने राजौंद पावर हाउस में तोड़फोड़ व आगजनी की और खेतों की तरफ भागते समय फायरिंग की, जिससे राम निवास नामक एक ग्रामीण के पैर में गोली लग गई थी।

38 गवाहों की गवाही के बाद 43 पन्नों में आया फैसला

मामले की पुलिस जांच पूरी होने के बाद चालान अदालत में पेश किया गया था। लंबे समय तक चली अदालती प्रक्रिया के दौरान कुल 38 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। सुनवाई के दौरान ही तीन आरोपियों—महिपाल, राजेश और रामफल—का देहांत हो गया। दोनों पक्षों की दलीलें और कानूनी पहलुओं को परखने के बाद सत्र न्यायाधीश ने 43 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चश्मदीद गवाह और शिकायतकर्ता अदालत के सामने ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके, जिसके चलते संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए सभी जीवित 27 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया गया।

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