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Karnal HAFED Controversy: करनाल हैफेड में अजीब खेल: जेल काटकर आए मैनेजर को मिले 10 खरीद केंद्र, उठ रहे गंभीर सवाल

AAmandeep Singh
करनाल हैफेड में अजीब खेल: जेल काटकर आए मैनेजर को मिले 10 खरीद केंद्र, उठ रहे गंभीर सवाल
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करनाल। दिसंबर 2023 में जब विजिलेंस ने 35 लाख रुपये के बिल पास करने के एवज में रिश्वत लेने के आरोप में हैफेड मैनेजर धर्मबीर को दबोचा था, तब विभाग ने अपनी साख बचाने की बात कही थी। धर्मबीर को करीब दो महीने जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। लेकिन अब, जब मामला अदालत में विचाराधीन है, उन्हें नेवल-1, 2, 3, जुंडला के बतरा और भाटिया गोदाम, असंध बफर और मंचूरी जैसे 10 केंद्रों की कमान सौंप दी गई है। सवाल यह है कि जो अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हो, उसे इतनी व्यापक जिम्मेदारी देना क्या पारदर्शिता के साथ समझौता नहीं है

स्टाफ की किल्लत या दागी अधिकारियों को संरक्षण?

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हैरानी की बात यह है कि हैफेड के भीतर यह संकट केवल धर्मबीर तक सीमित नहीं है। करनाल मंडी में तैनात खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के इंस्पेक्टर रविंद्र पर भी गबन के आरोपों की जांच चल रही है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि पिछले धान खरीद सीजन में हुए बड़े घोटालों के बाद करीब 20 अधिकारियों पर गाज गिरी थी, जिसके कारण विभाग में ‘साफ छवि’ वाले अफसरों का टोटा पड़ गया है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर या फिर मिलीभगत के चलते विवादित चेहरों को दोबारा मुख्यधारा में लाया जा रहा है।

45 किलोमीटर का दायरा: कैसे होगी निगरानी?

मैनेजर धर्मबीर को जिन केंद्रों का जिम्मा दिया गया है, उनके बीच की भौगोलिक दूरी प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी अव्यावहारिक नजर आती है। करनाल के नेवल से लेकर असंध के दनौली तक की दूरी करीब 45 किलोमीटर है। खरीद सीजन में जब मंडियों में पल-पल की निगरानी जरूरी होती है, तब एक ही व्यक्ति इतने बड़े क्षेत्र में फैले 10 केंद्रों पर पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित करेगा? कर्मचारियों का तर्क है कि इससे न केवल काम प्रभावित होगा, बल्कि गड़बड़ी की गुंजाइश भी बढ़ेगी।

जिला प्रबंधक की दलील: “हेड ऑफिस को लिखा है पत्र”

इस पूरे विवाद पर हैफेड के जिला प्रबंधक कृपाल दास का कहना है कि विभाग इस समय स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहा है। उन्होंने बताया कि अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग को लेकर मुख्यालय को पत्र भेजा गया है। दास ने दलील दी कि जैसे ही नया स्टाफ उपलब्ध होगा, वर्तमान में दिए गए अतिरिक्त प्रभार (चार्ज) को बांट दिया जाएगा। हालांकि, सवाल वही बरकरार है कि क्या नई नियुक्तियों तक करोड़ों रुपये की गेहूं खरीद का जिम्मा उन हाथों में सुरक्षित है, जिन पर पहले ही दाग लग चुके हैं?

प्रदेश सरकार एक ओर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करती है, वहीं करनाल में हैफेड की यह नई व्यवस्था इन दावों को आईना दिखा रही है।

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