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Man Rejects Rs72 LPA Offer: ₹72 लाख की नौकरी को सीधे 'ना': टेक कंपनी की शर्तों से परेशान होकर युवक ने ठुकराया ऑफर

AAmandeep Singh
Man Rejects Rs72 LPA Offer:  ₹72 लाख की नौकरी को सीधे 'ना': टेक कंपनी की शर्तों से परेशान होकर युवक ने ठुकराया ऑफर
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आज के दौर में जहां चंद हजार रुपयों की इंक्रीमेंट के लिए लोग दिन-रात एक कर देते हैं, वहीं कोई आपके सामने ₹72 लाख सालाना का पैकेज रख दे और आप उसे शालीनता से ‘बाय-बाय’ कह दें, तो यह किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है। लेकिन टेक गलियारों में इन दिनों यही हकीकत चर्चा का विषय बनी हुई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सॉफ्टवेयर डेवलपर रागिनी पांडे की एक पोस्ट ने कॉरपोरेट जगत के स्थापित नियमों को हिलाकर रख दिया है। रागिनी ने अपने दोस्त मनीष के उस रिजेक्शन ईमेल का स्क्रीनशॉट साझा किया है, जो उसने एक नामी कंपनी के एचआर को भेजा था।

अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवारों और युवाओं के लिए ₹72 लाख का पैकेज एक जीवन बदलने वाला सपना हो सकता है, लेकिन मनीष के लिए यह सौदा घाटे का नजर आया। इस रिजेक्शन लेटर ने यह साबित कर दिया है कि नई पीढ़ी के अनुभवी प्रोफेशनल्स अब सिर्फ बैंक बैलेंस देखकर अपनी जिंदगी का फैसला नहीं करते।

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आखिर क्यों ठुकराया इतना बड़ा ऑफर? शर्तों के जाल में फंसा था पैकेज

मनीष द्वारा एचआर को भेजे गए संदेश को अगर बारीकी से देखा जाए, तो यह साफ हो जाता है कि ऊपर से बेहद आकर्षक दिखने वाले इस पैकेज के भीतर कई ऐसी शर्तें थीं जो किसी भी कर्मचारी का दम घोंट सकती हैं। ऑफर को ठुकराने के पीछे निम्नलिखित ठोस कारण सामने आए हैं:

लचीलेपन (Flexibility) का अभाव: कंपनी में वर्क फ्रॉम होम या हाइब्रिड मॉडल की कोई गुंजाइश नहीं थी। हफ्ते के पांचों दिन दफ्तर आना अनिवार्य था, जो आज के टेक कल्चर के विपरीत है।

कमजोर लीव पॉलिसी: कंपनी के पास कर्मचारियों की सेहत और आपातकालीन स्थितियों के लिए कोई सुदृढ़ या व्यावहारिक लीव पॉलिसी मौजूद नहीं थी।

रीलोकेशन पर कंजूसी: नए शहर में शिफ्ट होने के लिए कंपनी कोई रीलोकेशन बोनस या वित्तीय सहायता देने को तैयार नहीं थी, जिसका पूरा बोझ कर्मचारी पर ही पड़ने वाला था।

सिर्फ 25% की हाइक: नई जगह रहने और खाने-पीने का खर्च (कॉस्ट ऑफ लिविंग) बेहद ज्यादा था, जबकि इतनी बड़ी जिम्मेदारी के एवज में मनीष को उनके पुराने वेतन पर सिर्फ 25 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी मिल रही थी।

मनीष ने एचआर को बेहद सधे और मैच्योर शब्दों में लिखा:

“अगर मैं अपने करियर के शुरुआती दौर (स्ट्रगलिंग फेज) में होता, तो शायद इन शर्तों को बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेता। लेकिन जिंदगी के इस मोड़ पर यह कॉन्ट्रैक्ट दोनों पक्षों के बीच बराबरी का होने के बजाय पूरी तरह सिर्फ कंपनी की तरफ झुका हुआ लग रहा है। खर्चों और कामकाजी माहौल को देखते हुए यह डील मेरे लिए व्यावहारिक नहीं है।”

इंटरनेट पर छिड़ी जंग: साहसिक फैसला या करियर की बड़ी भूल?

इस पोस्ट के वायरल होते ही लिंक्डइन से लेकर एक्स तक के यूजर्स दो गुटों में बंट गए हैं। कॉरपोरेट कल्चर को करीब से जानने वाले लोग इस पर अपनी अलग-अलग राय रख रहे हैं।

रागिनी ने खुद इस बात पर हैरत जताई कि इतने बड़े पैकेज को लात मारने के बाद भी उनके दोस्त मनीष के चेहरे पर शिकन या अफसोस का कोई भाव नहीं था। यह घटना इस बात का साफ इशारा है कि अब कंपनियां केवल पैसों का लालच देकर हुनरमंद लोगों को बंधुआ मजदूर नहीं बना सकतीं; उन्हें काम का एक सेहतमंद माहौल भी देना ही होगा।

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