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Mickey Mouse History: मिकी माउस की आवाज के 97 साल: जब अखबार से निकाले गए वॉल्ट डिज्नी की किस्मत एक चूहे ने बदल दी

GGaganpreet Kaur
मिकी माउस की आवाज के 97 साल: जब अखबार से निकाले गए वॉल्ट डिज्नी की किस्मत एक चूहे ने बदल दी
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सिनेमा और कार्टून की दुनिया में ‘मिकी माउस’ महज एक काल्पनिक स्केच या किरदार भर नहीं है। यह कहानी है इंसानी कल्पनाशक्ति की, कभी न हार मानने वाले जज्बे की और उस अटूट भरोसे की जिसने एक बार सड़क पर आ चुके इंसान को दुनिया के सबसे बड़े एंटरटेनमेंट एम्पायर का बेताज बादशाह बना दिया। मिकी के इस तिलिस्म को समझने के लिए हमें आज से करीब सवा सौ साल पीछे अमेरिका के शिकागो शहर चलना होगा।

5 दिसंबर 1901 को जन्मे वॉल्टर एलियास डिज्नी (वॉल्ट डिज्नी) का बचपन बेहद तंगहाली में बीता। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि उन्हें स्कूल के दिनों में ही अखबार बांटने जैसे छोटे-मोटे काम करने पड़े। लेकिन इन दिक्कतों के बीच भी उनके भीतर का कलाकार हमेशा जिंदा रहा, जो घंटों कागज पर लकीरें खींचकर कार्टून बनाने का सपना देखता था।

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जब एडिटर ने कहा- “तुम्हारे पास कल्पनाशक्ति ही नहीं है”

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रेड क्रॉस की एंबुलेंस पर कार्टून बनाने वाले वॉल्ट को किसी ने अखबारों के लिए स्केच बनाने की सलाह दी। उन्होंने सलाह मानी और एक प्रतिष्ठित अखबार में बतौर कार्टूनिस्ट काम भी शुरू किया। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। अखबार के संपादक ने उन्हें यह कहकर नौकरी से बर्खास्त कर दिया कि उनके पास “क्रिएटिविटी और नई सोच” की भारी कमी है। इस अपमान ने वॉल्ट को अंदर तक झकझोर दिया। अपनी रचनात्मकता पर उठे इस सवाल का जवाब देने के लिए उन्होंने 1926 में अपने भाई रॉय के साथ मिलकर ‘डिज्नी ब्रदर्स कार्टून स्टूडियो’ की नींव रखी।

‘ओसवाल्ड’ छिना तो टूट गए थे वॉल्ट डिज्नी

स्टूडियो शुरू करने के बाद वॉल्ट ने यूनिवर्सल पिक्चर्स के लिए ‘ओसवाल्ड द लकी रैबिट’ नाम का एक शानदार कैरेक्टर तैयार किया। ओसवाल्ड देखते ही देखते अमेरिका में हिट हो गया। लेकिन बिजनेस की चालबाजियों से अनजान वॉल्ट को तब बड़ा झटका लगा, जब यूनिवर्सल पिक्चर्स ने कानूनी दांवपेच खेलकर ओसवाल्ड के सारे कॉपीराइट्स खुद के नाम करवा लिए। वॉल्ट के हाथ से उनका अपना गढ़ा हुआ बच्चा छिन चुका था। वह खाली हाथ थे, लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि अब वह जो भी बनाएंगे, उसके मालिक वो खुद होंगे।

और दफ्तर के उस चूहे ने बदल दी किस्मत

ओसवाल्ड की कामयाबी से यूनिवर्सल पिक्चर्स करोड़ों डॉलर कमा रहा था और वॉल्ट डिज्नी एक नए किरदार की तलाश में रात-दिन एक कर रहे थे। उन्होंने गाय, घोड़े, मेंढक सब पर स्केच बनाए, लेकिन बात नहीं बन रही थी। इसी तनाव के बीच एक दिन वॉल्ट अपने दफ्तर के सोफे पर मायूस बैठे थे। तभी एक छोटा सा चूहा टेबल पर आया और उछल-कूद करने लगा।

वॉल्ट ने पहले उसे नजरअंदाज किया, लेकिन वह चूहा बेखौफ होकर उनके पैरों के पास आकर मोजे कुतरने लगा। चूहे की इस बेबाकी और फुर्ती ने अचानक वॉल्ट के दिमाग की बत्ती जला दी। वह चिल्ला उठे— “मुझे मेरा नया हीरो मिल गया!” उन्होंने तुरंत पेंसिल उठाई और उस चूहे का एक कार्टून बना डाला, जिसे शुरुआती नाम दिया गया ‘मार्टिमर माउस’।

पत्नी की सलाह पर ‘मार्टिमर’ बना ‘मिकी’

जब वॉल्ट ने इस नए चूहे का स्केच अपनी पत्नी लिली को दिखाया, तो उन्हें ‘मार्टिमर’ नाम थोड़ा भारी और उबाऊ लगा। लिली ने ही इस कैरेक्टर में कुछ बदलाव सुझाए; उसे सफेद दस्ताने और पीले जूते पहनाए गए और उसका नाम बदलकर कर दिया गया— मिकी माउस।

साल 1928 में मिकी को लेकर दो मूक (साइलेंट) शॉर्ट फिल्में ‘प्लेन क्रेजी’ और ‘द गैलोपिन गैचो’ बनीं, जिन्हें काफी पसंद किया गया। लेकिन मिकी की लोकप्रियता का असली विस्फोट होना अभी बाकी था।

31 मई 1929: जब मिकी माउस पहली बार बोल पड़ा

अगले ही साल, यानी 31 मई 1929 को डिज्नी ने मिकी माउस की पहली बोलती फिल्म ‘द कार्निवल किड’ रिलीज की। इस फिल्म में जैसे ही मिकी माउस के मुंह से आवाज निकली, सिनेमाघरों में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। मिकी को वह ऐतिहासिक आवाज किसी और ने नहीं, बल्कि खुद वॉल्ट डिज्नी ने दी थी। इस एक फिल्म ने वॉल्ट डिज्नी की दुनिया और एनिमेशन का इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया। इसके बाद मिकी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और वह आज भी दुनिया का सबसे अमीर और लोकप्रिय कार्टून कैरेक्टर बना हुआ है।

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