Narnaul: आहार हमारे स्वास्थ्य का मुख्य आधार स्तम्भ
Narnaul: आहार हमारे स्वास्थ्य का मुख्य आधार स्तम्भ है। सुख की इच्छा रखने वाले लोगों को चाहिए की वह आहार, आचार और सभी चेष्टाओं में हितकर वस्तु के सेवन में अधिक प्रयत्न करें। आधुनिक विज्ञान संतुलित आहार पर बल देता है, परन्तु आयुर्वेद संतुलित आहार के साथ साथ आहार की व्यक्तिगत विशेषता को भी पोषण के लिए महतवपूर्ण मानता है।
बाबा खेतानाथ राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल
के संहिता एवं सिद्धांत विभाग से एसोसिएट प्रोफेसर डॉ ज्योति सिहाग ने बताया कि देखने और सुनने में आहार शब्द से हम समझते हैं भोजन सभी के लिए समान होगा तो सभी के शरीर में एक जैसा पोषण करेगा पर क्या आप जानते हैं की इस समान भोजन का पोषण व्यक्ति विशेष की प्रकृति ,वय, काल और देश पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि आहार से सम्बंधित बहुत ही उपयोगी सूत्र आयुर्वेद में वर्णित हैं और ये आहार सम्बंधित सूत्र खुद में अथाह विज्ञान समेटे हुए प्रतीत होते है।
इन सूत्रों का विज्ञान:
काल भोजन आरोग्य कराणाम- समय पर भोजन करना आरोग्य देने वाले कारणों में श्रेष्ठ है। अब सवाल ये है की भोजन का सही समय क्या है तो इसका जवाब है की जब पूर्व में किया गया भोजन सही से पच गया हो, पेट में हल्कापन लगे और भूख महसूस हो। आयुर्वेद में भोजन के लिए दो काल प्रातः और सांय काल ही उपयुक्त कहे गए हैं।
एकाशन भोजन सुख परिणामकरणाम -सुख देने वाले परिणाम जनक कारणों में केवल एक समय भोजन करना पर्याप्त है, ये सूत्र उन लोगों के लिए लाभकारी है जो आध्यात्मिक हैं या होना चाहते है या फिर जिनका दैनिक क्रियाकलाप अल्प हैं। केवल एक समय भोजन करना सबके लिए संभव नहीं है क्योंकि अगर भूख लगने पर भोजन न किया जाये तो शरीर दुर्बल हो सकता है जिस से स्वास्थ्य हानि हो सकती है। आहार त्याग देने से चित्त की शुद्धि हो जाती है और चित्त की शुद्धि होने से क्रम से ज्ञान होता जाता है और अज्ञान की ग्रंथियां टूट जाती हैं। इसका पालन जितेन्द्रिय और सात्विक लोग ही कर सकते हैं।
अतिमात्राशन आमप्रदोष हेतूनां – यहां आम का अर्थ पाचन अग्नि की दुर्बलता या अन्य कारणों से अर्ध पक्व अन्न से उत्पन्न ऐसा द्रव्य जो अनेक बिमारिओं का कारण बनता है, इस आम रूपी विष का मुख्य कारण अतिमात्रा में भोजन का सेवन माना जाता है। भोजन की सही मात्रा भोजन करने वाला व्यक्ति ही अनुभव कर सकता है। खाना खाते समय जब मन में तृप्ति का भाव उत्पन्न हो जाये वो क्षण भोजन से निवृत होने का होता है। अगर भोजन करते समय, हम बात करने में या मोबाइल या टीवी देखने में व्यस्त रहते हैं तो हम तृप्ति को महसूस नहीं कर पाते और मात्रा से ज्यादा भोजन कर लेते हैं। जो धीरे धीरे आम का संचय कर भविष्य में अनेक पाचन सम्बन्धी समस्याओं का जनक बन जाता है। इसलिए भोजन करते समय ध्यान केवल भोजन ग्रहण करने पर ही केंद्रित रहना चाहिए।
विषमाशन अग्नि वैषम्य कराणाम – इस सूत्र में विषम अशन का अर्थ है खाने में विषमता यानि भूख लगने पर भी खाना न खाना, मात्रा से कम या ज्यादा खाना, असमय में खाना खाना। ये सभी आदतें हमारी पाचकाग्नि को प्रभावित कर देती हैं और पाचन सम्बन्धी समस्यों को पैदा करती हैं। अपनी भूख के महत्व को पहचानिएं उसे नजरअंदाज मत कीजिए।
गुरु भोजन दुर्विपाक कराणाम
-गुरु का अर्थ यहां वजन में ज्यादा या भारी भोजन नहीं, अपितु व्यक्ति विशेष की अग्नि के अनुसार भोजन के पाचन की क्षमता पर निर्भर करता है। इसके साथ ही भोजन की गुरुता और लघुता भोजन बनाने में प्रयुक्त द्रव्यों पर भी निर्भर करती है। जैसे मूंग,आमला आदि लघु द्रव्य हैं और घी, दूध गुरु द्रव्य हैं। इसलिए अगर कोई द्रव्य हमे देर से पचता है तो उसका मात्रा में सेवन करना चाहिए क्योंकि गुरु द्रव्य पाचन अग्नि को जल्दी प्रभावित करते हैं। अगर हम आयुर्वेद के इन सूत्रों को जो देखने और सुनने में साधारण पर गहन विज्ञान से समावेशित हैं, अपने दैनिक जीवन में अपना लेते हैं तो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हुए खुद को स्वस्थ रखने के साथ साथ अनेक बिमारियों से बचाव भी कर सकते हैं। अक्सर सुना भी गया है की सभी बिमारियों की शुरुआत पेट से ही होती है।
तो आइये आयुर्वेद दिवस पर इन सूत्रों को अपनाने का संकल्प लेकर खुशहाल भविष्य के निर्माण में सहभागी बने। अपने शरीर की रक्षा रुपी धर्म का निर्बाध पालन करने में समर्थ रहें क्योंकि ये शरीर आहार से ही सम्भव है।
