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Nangal Chaudhary land acquisition dispute: नांगल चौधरी लॉजिस्टिक हब पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हरियाणा सरकार की मनमानी पर लगी रोक

GGaganpreet Kaur
नांगल चौधरी लॉजिस्टिक हब पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हरियाणा सरकार की मनमानी पर लगी रोक
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नारनौल (सोनल यादव)। दक्षिण हरियाणा के नांगल चौधरी इलाके में बनने वाले 900 एकड़ के प्रस्तावित लॉजिस्टिक हब को लेकर सरकार और किसानों के बीच चल रही शह-मात के खेल में अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने दखल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसले में हरियाणा सरकार को कड़ा झटका देते हुए विवादित जमीन पर किसी भी तरह की जोर-जबरदस्ती या दखलअंदाजी पर तुरंत रोक लगा दी है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसानों की जमीनों पर यथास्थिति बनी रहेगी और सरकार को हर हाल में साल 2013 के केंद्रीय भूमि अधिग्रहण कानून के कड़े प्रावधानों के तहत ही उचित मुआवजा देना होगा।

क्या है पूरा विवाद और सरकार का ‘कंसोलिडेशन’ पैंतरा?

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दरअसल, नांगल चौधरी क्षेत्र के तीन गांवों— बसीरपुर, तलोट और घाटाशेर की करीब 900 एकड़ जमीन पर इस मेगा प्रोजेक्ट की रूपरेखा साल 2016 में तैयार हुई थी। आरोप है कि सरकार ने उस वक्त पारदर्शी ‘भूमि अधिग्रहण कानून 2013’ को ठंडे बस्ते में डालकर एक कथित ‘सहमति मॉडल’ तैयार किया और जमीन का भाव महज 30 लाख रुपये प्रति एकड़ तय कर दिया। इसके खिलाफ किसान पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट चले गए।

हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2024 को किसानों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार के ‘लैंड कंसोलिडेशन एक्ट 2017’ की धारा-7 को असंवैधानिक करार दे दिया था। इसके बावजूद, हरियाणा सरकार ने पिछले महीने 15 मई 2026 को एक नया आदेश जारी कर किसानों को उसी विवादित कानून की धारा-7 के तहत जमीन सौंपने का फरमान सुना दिया। सरकार के इसी अड़ियल रुख के खिलाफ 91 किसानों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

प्रशांत भूषण की दलीलों के आगे टिक नहीं पाई सरकारी दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में किसानों की तरफ से देश के नामचीन और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पैरवी की। उन्होंने अदालत के सामने अकाट्य तर्क रखते हुए बताया कि कैसे सरकार एक मृत और असंवैधानिक घोषित हो चुकी धारा का सहारा लेकर किसानों की बेशकीमती जमीन कौड़ियों के भाव हथियाना चाहती है। इन दलीलों को सही मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 मई 2026 को अंतरिम आदेश जारी कर सरकार के हाथ बांध दिए। कोर्ट ने दोटूक कहा कि किसानों के साथ कोई जोर-जबरदस्ती नहीं होगी और आगे की पूरी प्रक्रिया 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के दायरे में ही चलेगी।

“हम विकास के विरोधी नहीं, लेकिन हब लटकने की दोषी खुद सरकार”

इस लंबी कानूनी लड़ाई में किसानों का झंडा बुलंद करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् इंजीनियर तेजपाल यादव ने प्रशासनिक नीयत पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि नियमानुसार साल 2016-17 में भी इस जमीन का न्यूनतम सरकारी मुआवजा कम से कम 70 लाख रुपये प्रति एकड़ बनता था। लेकिन एक बिचौलिया कंपनी के जरिए खेल रचा गया और किसानों की हकमारी करके एचएसआईआईडीसी (HSIIDC) को सिर्फ 30 लाख रुपये प्रति एकड़ में जमीन दिलाने की कोशिश हुई।

तेजपाल यादव ने दोटूक लहजे में कहा, “इलाके का कोई भी किसान इस बड़े प्रोजेक्ट या विकास का विरोधी नहीं है। हम सब चाहते हैं कि लॉजिस्टिक हब जल्द से जल्द बने ताकि स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले। लेकिन आज इस देरी के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकार के नुमाइंदे जिम्मेदार हैं। अगर उन्होंने शुरू में ही लालच छोड़कर 2013 के कानून के तहत सही मुआवजा दे दिया होता, तो यह हब कब का बनकर तैयार हो चुका होता।” सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद अब गेंद एक बार फिर सरकार के पाले में है कि वह किसानों को उनका वाजिब हक देकर इस ठप पड़े प्रोजेक्ट को कैसे आगे बढ़ाती है।

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