Toothbrush History: सुबह उठते ही सबसे पहले हाथ टूथब्रश पर जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मुंह की सफाई का यह आधुनिक जरिया हमारे पास कहां से आया? आज की तारीख यानी 26 जून का इतिहास इस लिहाज से बेहद दिलचस्प है। आज से ठीक 528 साल पहले, साल 1498 में चीन के मिंग वंश के सम्राट राजा होंगझी ने एक ऐसे टूथब्रश का पेटेंट कराया था, जिसे आज के प्लास्टिक और नायलॉन वाले ब्रश का पूर्वज कहा जा सकता है। हालांकि, दांतों को साफ और सेहतमंद रखने की इंसानी जद्दोजहद का इतिहास इससे भी हजारों साल पुराना है।
दातुन से शुरू हुई थी चमकते दांतों की कहानी
इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि करीब 5 हजार साल पहले हमारे पूर्वज दांतों की सुरक्षा के प्रति जागरूक हो चुके थे। तब आज की तरह कोई फैक्ट्री नहीं थी, इसलिए प्रकृति की शरण ली गई। लोग पेड़ों की पतली और औषधीय टहनियों के एक सिरे को चबाकर उसे ब्रश जैसा रेशेदार बना लेते थे। भारत में इस परंपरा को ‘दातुन’ कहा गया, जो आज भी ग्रामीण इलाकों में उतनी ही लोकप्रिय है। करीब 1600 ईसा पूर्व चीन के लोगों ने इसमें एक नया प्रयोग किया। उन्होंने सांसों की दुर्गंध दूर करने के लिए खुशबूदार और औषधीय टहनियों को चबाना शुरू किया, जो एक तरह से आज के मिंट फ्लेवर टूथपेस्ट का प्राचीन रूप था।
सूअर के बालों और हड्डी से बना पहला कमर्शियल ब्रश
समय बदला और तकनीक में भी सुधार हुआ। टहनियों के बाद इंसानों ने जानवरों के कड़े बालों को लकड़ी या धातु के हत्थे से जोड़कर ब्रश का आकार देना शुरू किया। इस कड़ी में सबसे बड़ा बदलाव राजा होंगझी के दौर में आया। उन्होंने ठंडे इलाकों में पाए जाने वाले सूअर के गर्दन के सख्त बालों को चुना और उन्हें सुई की मदद से हड्डी या बांस के छोटे टुकड़े पर फिट कराया। यह प्रयोग इतना कामयाब रहा कि इससे दांतों के कोनों की सफाई आसान हो गई। इस अनोखे अविष्कार की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए चीनी सम्राट ने इसका पेटेंट अपने नाम करा लिया, जिसके बाद यह तकनीक पूरी दुनिया में फैली।
राख और अंडे के छिलकों से चमकते थे दांत
हैरानी की बात यह है कि जब इस ब्रश का आविष्कार हुआ, तब दुनिया में टूथपेस्ट का नामोनिशान नहीं था। लोग ब्रश के साथ दांतों का पीलापन हटाने और कीड़ों से बचाने के लिए अजीबोगरीब चीजें इस्तेमाल करते थे। उस दौर में चूल्हे की राख, बारीक मिट्टी, सूखे पत्तों का पाउडर और यहां तक कि अंडे के छिलकों को पीसकर बनाए गए पाउडर से दांत मांजे जाते थे। भले ही तब ओरल हेल्थ को लेकर आज जैसी वैज्ञानिक समझ न रही हो, लेकिन पुराने दौर के इन देसी और प्राकृतिक नुस्खों ने ही आज के आधुनिक डेंटिस्ट्री की मजबूत बुनियाद रखी थी।

