Parenting Tips: अपनी जिंदगी के खालीपन को दूर करने और घर-आंगन को नन्हीं मुस्कुराहटों से सराबोर करने के लिए आज बहुत से कपल्स बच्चा गोद (Adopt) लेते हैं। गोद लिए हुए इस लाडले पर मां-बाप अपनी पूरी कायनात और खुशियां न्योछावर करने से भी पीछे नहीं हटते। वे चाहते हैं कि दुनिया भर का लाड-प्यार उनके बच्चे के कदमों में आ जाए। लेकिन इस असीम प्यार के बीच एक ऐसा नाजुक सवाल भी होता है, जो गोद लेने वाले हर माता-पिता को अंदर ही अंदर परेशान करता है— ‘क्या बच्चे को कभी यह बताना चाहिए कि वह गोद लिया हुआ है? और अगर हां, तो वह सही वक्त कब आएगा और बात की शुरुआत कैसे होगी?’
सच छिपाना पड़ सकता है भारी, खुद बताएंगे तो मजबूत होगा भरोसा
इस बेहद संवेदनशील विषय पर बाल मनोवैज्ञानिकों और पारिवारिक विशेषज्ञों की राय बेहद स्पष्ट है। लगभग हर एक्सपर्ट का यही मानना है कि बच्चे से उसकी पहचान से जुड़ा सच कभी नहीं छिपाना चाहिए। अगर बच्चा यह बात अचानक किसी रिश्तेदार, पड़ोसी या बाहरी शख्स के मुंह से सुनता है, तो वह भावनात्मक रूप से बुरी तरह बिखर सकता है। उसके मन में अपने ही माता-पिता के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा हो सकता है। इसके विपरीत, अगर यही कड़वा सच माता-पिता खुद बेहद संजीदगी से उसके सामने रखते हैं, तो बच्चे का अपने परिवार पर भरोसा और ज्यादा गहरा हो जाता है। वह अपनी इस पहचान को बहुत ही सहजता और बिना किसी हीन भावना के स्वीकार कर लेता है।
बातचीत के लिए क्या है सबसे सही उम्र?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बेहद खास बातचीत के लिए वैसे तो कोई एक तारीख या उम्र तय नहीं की जा सकती, लेकिन ८ से १० साल की उम्र के बीच इस विषय पर धीरे-धीरे बात शुरू की जा सकती है। यह वह दौर होता है जब बच्चा रिश्तों के ताने-बाने और परिवार की बुनियादी अवधारणा को समझने के काबिल हो जाता है। इस उम्र में उसे बेहद सरल और बाल-सुलभ भाषा में यह समझाया जा सकता है कि दुनिया में हर परिवार के बनने का तरीका एक जैसा नहीं होता। कुछ परिवार खून के रिश्तों से बनते हैं, तो कुछ को ऊपर वाला सीधे दिल के रिश्ते से जोड़ देता है। किशोरावस्था (टीनेज) में कदम रखने से पहले बच्चे को यह हकीकत पूरी तरह साफ हो जानी चाहिए, ताकि वह बाहरी दुनिया के सवालों का सामना पूरे आत्मविश्वास के साथ कर सके।
‘तुम सगे नहीं हो’ जैसे चुभते शब्दों से बचें, अपनाने की कहानी सुनाएं
जब आप बच्चे से इस विषय पर बात करें, तो शब्दों का चयन बहुत नाप-तोल कर करें। ‘तुम हमारे सगे बच्चे नहीं हो’ या ‘हम तुम्हें कहीं से लेकर आए थे’ जैसी रूखी और चुभने वाली भाषा का इस्तेमाल भूलकर भी न करें। इसके बजाय बच्चे को यह एहसास दिलाएं कि वह इस परिवार की सबसे बड़ी पसंद, खुशी और दुआओं का हिस्सा है। उसे यह समझाएं कि परिवार सिर्फ खून की बूंदों से नहीं, बल्कि बेइंतहा प्यार और अटूट अपनेपन की डोर से बंधे होते हैं। गोद लिया जाना उसकी जिंदगी की कहानी का महज एक खूबसूरत पन्ना है, कोई ऐसी कमी नहीं जिसे छुपाया जाए।
सवालों की बौछार से न डरें, अपनेपन की गर्माहट रखें बरकरार
यह सच जानने के बाद स्वाभाविक है कि बच्चे के बाल-मन में सवालों का एक बड़ा बवंडर उठेगा। वह आपसे अजीबोगरीब सवाल पूछ सकता है। ऐसे में चिढ़ने या बात को टालने के बजाय उसके हर सवाल का पूरी ईमानदारी और धैर्य के साथ जवाब दें। उसकी हर शंका को शांत करें और उसकी भावनाओं को तवज्जो दें। सबसे जरूरी बात यह है कि इस सच के सामने आने के बाद भी घर के माहौल और बच्चे के प्रति आपके लाड-प्यार में रत्ती भर भी कमी नहीं आनी चाहिए। उसे हर पल वही पुराना सम्मान, सुरक्षा और बराबरी का हक मिलना चाहिए, जो किसी भी आम बच्चे को अपने माता-पिता से मिलता है।

