Rohtak Bhaini Chandrapal Village: 300 साल पुरानी रीत, रोहतक के गांव ने 24 घंटे के लिए सील की सीमाएं, न कोई अंदर आया ना बाहर गया
300 साल पुरानी रीत, रोहतक के गांव ने 24 घंटे के लिए सील की सीमाएं, न कोई अंदर आया ना बाहर गया
Rohtak Bhaini Chandrapal Village: तकनीक और आधुनिकता के इस दौर में जहां परंपराएं धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही हैं, (Haryana Unique Village Traditions) वहीं हरियाणा के रोहतक जिले से सामाजिक एकजुटता और आस्था की एक अद्भुत तस्वीर सामने आई है। रोहतक के भैणी चंद्रपाल गांव में ग्रामीणों ने स्वैच्छिक रूप से 24 घंटे (Rohtak Village 24 Hour Boundary Lock) के लिए पूरे गांव की नाकाबंदी कर दी।
इस दौरान गांव की सीमाओं पर पहरा लगा दिया गया ताकि न तो कोई बाहरी व्यक्ति अंदर प्रवेश कर सके और न ही कोई ग्रामीण गांव से बाहर जाए। हैरान करने वाली बात यह है कि इसके पीछे किसी सरकार या प्रशासन का आदेश नहीं, बल्कि करीब तीन शताब्दियों पुरानी एक धार्मिक मान्यता है।
प्राचीन शिव मंदिर से उठी धूनी, युवाओं ने संभाली कमान (Bhaini Chandrapal Ancient Shiv Temple)
इस पारंपरिक अनुष्ठान का आगाज गांव के बड़े तालाब (जोड़) पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर से हुआ। सुबह मंदिर परिसर में पूरे विधि-विधान से विशेष पूजा-अर्चना की गई और पवित्र धूनी प्रज्वलित की गई। इसके बाद गांव के युवाओं की अलग-अलग टोलियां इस धूनी को लेकर गांव की हर गली, चौराहे और प्रत्येक घर तक पहुंचीं। धूनी के धुएं से पूरे गांव का वातावरण सुगंधित और पवित्र हो गया। इस दौरान वातावरण में सुख-शांति, समृद्धि और आरोग्य की कामना की गई।
मवेशियों की सेहत और महामारी से बचाव से जुड़ा है इतिहास
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा लगभग 300 साल पहले पूर्वजों द्वारा शुरू की गई थी। उस दौर में जब पशुओं में खुरपका-मुंहपका या अन्य प्राणघातक महामारियां फैलती थीं, तब गांव को बाहरी संक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए इस तरह ‘सीमाबंदी’ (धूनी) (Dhuni Tradition Haryana Villages) का नियम बनाया गया था। मान्यता है कि शिव मंदिर से उठी पवित्र धूनी को पूरे गांव में घुमाने और 24 घंटे तक गांव की सीमाएं बंद रखने से गांव में किसी भी प्रकार का संकट या बीमारी प्रवेश नहीं कर पाती।
बदलाव के दौर में भी कायम है पूर्वजों की धरोहर
समय के साथ गांव का ढांचा बदला, रहन-सहन बदला, लेकिन पूर्वजों द्वारा सौंपी गई इस अमानत को लेकर ग्रामीणों की आस्था रत्ती भर भी कम नहीं हुई है। सबसे खास बात यह रही कि आज के दौर के युवाओं ने भी इस अनुष्ठान में पूरी श्रद्धा के साथ हिस्सा लिया और अनुशासन का पालन कराया। 24 घंटे की समयसीमा पूरी होने के बाद ही गांव के रास्ते दोबारा आम आवाजाही के लिए खोले गए।
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