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Elder abuse signs: बुजुर्गों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को कैसे पहचानें? वर्ल्ड एल्डर एब्यूज अवेयरनेस डे पर विशेष रिपोर्ट

GGaganpreet Kaur
बुजुर्गों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को कैसे पहचानें? वर्ल्ड एल्डर एब्यूज अवेयरनेस डे पर विशेष रिपोर्ट
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घर के बुजुर्ग महज परिवार का कोई हिस्सा या कोई सदस्य नहीं होते, बल्कि वे उस बरगद की तरह हैं जिसकी छांव में कई पीढ़ियां हंसती-खेलती और संवरती हैं। उन्होंने अपनी पूरी जवानी और खून-पसीना अपनों के भविष्य को संवारने में लगा दिया होता है। लेकिन बेहद अफसोस और चिंता की बात यह है कि जब उनके खुद के हाथ कांपने लगते हैं और ढलती उम्र में उन्हें सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब कई बार उन्हें अपनों के ही घर में उपेक्षा, तीखे तानों और बदसलूकी का कड़वा घूंट पीना पड़ता है। विडंबना देखिए कि इस दुर्व्यवहार के संकेत शुरुआत में इतने महीन और सामान्य लगते हैं कि लोग इन्हें उम्र का तकाजा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।

इसी खामोश दर्द और सामाजिक बुराई की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए हर साल १५ जून को ‘विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस’ मनाया जाता है। समाज को यह समझना होगा कि बुजुर्गों के साथ गलत व्यवहार का मतलब सिर्फ शारीरिक मारपीट नहीं है; किसी को बात-बात पर जलील करना, उनकी बुनियादी जरूरतों को अनदेखा करना या उन्हें डराकर रखना भी इसी अपराध का हिस्सा है।

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व्यवहार में अचानक आई तब्दीली को समझें

अगर घर के कोई बुजुर्ग जो कभी हंसते-बोलते थे, अचानक बेहद शांत रहने लगें, कमरों में खुद को कैद कर लें या बातचीत से कतराने लगें, तो समझ लीजिए कि उनके दिल पर कोई गहरी चोट लगी है। लगातार उपेक्षा और अकेलेपन का अहसास उन्हें अवसाद (Depression) की ओर धकेल देता है। इसके अलावा, अगर उनके शरीर पर अक्सर चोट के निशान दिखें या वे बार-बार ‘बेड से गिरने’ जैसी बात कहें, तो हर बार इसे केवल एक हादसा मान लेना भूल होगी। परिवार के जिम्मेदार सदस्यों को इसकी तह तक जाना चाहिए।

लापरवाही की आड़ में अनदेखी और आर्थिक कंगाली

कई बार देखा गया है कि बुजुर्गों के कपड़े गंदे रहते हैं, उन्हें समय पर भोजन या दवाइयां नहीं दी जातीं। चूंकि उम्र के इस पड़ाव पर वे अपनी शिकायतें दर्ज कराने में झिझकते हैं, इसलिए उनकी यह खामोशी और गहरी होती चली जाती है। एक और स्याह पहलू है— आर्थिक शोषण। अगर कोई बुजुर्ग अचानक अपनी पेंशन या जमा-पूंजी को लेकर हद से ज्यादा परेशान दिखने लगे या बैंक के काम के नाम पर घबराने लगे, तो मुमकिन है कि उन पर पैसों को लेकर पारिवारिक या बाहरी दबाव बनाया जा रहा हो।

डर का माहौल और हमारा फर्ज

यदि घर का कोई सयाना सदस्य किसी खास रिश्तेदार या केयरटेकर के सामने आते ही सहम जाता है या अपनी बात कहने से कतराता है, तो यह खतरे की घंटी है। इस मानसिक प्रताड़ना का असर उनके शरीर से ज्यादा उनके आत्मसम्मान पर पड़ता है। अंततः, इस समस्या का एकमात्र समाधान कानून की किताबों में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार में है। दिन भर की मसरूफियत में से महज आधा घंटा निकालकर उनके पास बैठना, उनकी पुरानी कहानियों को सुनना और उन्हें यह अहसास दिलाना कि वे आज भी परिवार की धड़कन हैं, किसी भी थेरेपी से बढ़कर है। याद रखिए, ढलती उम्र को सुविधाओं की चकाचौंध से ज्यादा अपनेपन और अदब की जरूरत होती है।

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