Yes Bank Case: यस बैंक के AT-1 बॉन्ड राइट-डाउन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि जब यस बैंक अपना कामकाज चलाता रहा और उसकी वित्तीय स्थिति में गंभीर खामियां सामने आ रही थीं, तब RBI मूक दर्शक बना रहा। कोर्ट के मुताबिक, बैंक के CET1 अनुपात को गिरकर 0.6 प्रतिशत तक पहुंचने देने और प्रशासनिक विफलताओं का नुकसान निवेशकों पर डालना उचित नहीं था। अदालत ने कहा कि यस बैंक के कामकाज में गंभीर गड़बड़ियां काफी पहले सामने आ गई थीं। बैंक के कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही भी शुरू की गई थी। इसके बावजूद, निवेशकों को उन खामियों की कीमत चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिनके लिए वे जिम्मेदार नहीं थे।
यह मामला यस बैंक के अतिरिक्त टियर-1 यानी AT-1 बॉन्ड को राइट-डाउन करने से जुड़ा है। इन बॉन्ड के मूल्य को घटाकर शून्य किए जाने के बाद निवेशकों के दावे खत्म हो गए थे। विवाद इस बात पर था कि क्या पुनर्गठन योजना लागू होने के बाद बैंक के प्रशासक को ऐसा फैसला लेने का अधिकार था।सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम (BR Act) के तहत नियुक्त प्रशासक को कानून के दायरे में रहकर ही काम करना होता है। वह बैंक के निदेशक मंडल की जगह काम करता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसे कानून से बाहर जाकर फैसले लेने का अधिकार मिल जाता है। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रशासक अपनी निर्धारित शक्तियों से बाहर जाकर कोई कार्रवाई करता है, तो उसे अवैध और शून्य माना जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासक को वह अधिकार इस्तेमाल करने वाला नहीं माना जा सकता, जो वास्तव में RBI को दिए गए थे।
पुनर्गठन योजना से हटाया गया था बॉन्ड राइट-डाउन का प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पुनर्गठन योजना के मसौदे और अंतिम योजना के बीच के अंतर पर भी गौर किया। अदालत के अनुसार, योजना के ड्राफ्ट में AT-1 बॉन्ड को स्थायी रूप से राइट-डाउन करने का स्पष्ट प्रावधान था। हालांकि, 13 मार्च 2020 को जारी अंतिम पुनर्गठन योजना में इस प्रावधान को हटा दिया गया था। इसके बावजूद, अगले ही दिन यानी 14 मार्च 2020 को प्रशासक ने बॉन्ड राइट-डाउन करने का फैसला लिया। इस कार्रवाई के बाद बॉन्डधारकों के दावे खत्म हो गए। अदालत ने माना कि इस फैसले के तरीके पर गंभीर सवाल उठते हैं, क्योंकि यह RBI के मास्टर सर्कुलर और बॉन्ड से जुड़े इंफॉर्मेशन मेमोरेंडम की शर्तों के अनुरूप नहीं था।
बेसल III कैपिटल रेगुलेशंस पर RBI के मास्टर सर्कुलर की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि ‘पॉइंट-ऑफ-नॉन-वायबिलिटी’ यानी बैंक के व्यवहार्य न रह पाने की स्थिति से जुड़ा ट्रिगर सक्रिय होने पर आवश्यक कन्वर्जन या राइट-डाउन पुनर्गठन योजना लागू होने से पहले किया जाना चाहिए था। अदालत ने स्पष्ट किया कि सवाल केवल यह नहीं है कि AT-1 बॉन्ड का राइट-डाउन किया जा सकता था या नहीं। असली सवाल यह है कि यह कार्रवाई किस प्रक्रिया के तहत की गई और क्या उस प्रक्रिया में लागू नियमों का पालन हुआ। कोर्ट ने RBI, यस बैंक और प्रशासक की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 8,514 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के बॉन्ड से जुड़े मामले को जिस तरह संभाला गया, वह संदिग्ध था। अदालत के अनुसार, निवेशकों को इस तरह के अनावश्यक जोखिम में डालने से बचा जा सकता था। AT-1 बॉन्ड का उद्देश्य बैंक को वित्तीय संकट के दौरान सहारा देना और उसे पूरी तरह विफल होने से बचाने में मदद करना है। अदालत ने कहा कि यदि RBI और यस बैंक ने मास्टर सर्कुलर की शर्तों के अनुसार काम किया होता, तो इन बॉन्ड का उद्देश्य बेहतर तरीके से पूरा हो सकता था।
व्यक्तिगत निवेशकों को हाई-रिस्क बॉन्ड बेचने पर भी चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यस बैंक की ओर से व्यक्तिगत निवेशकों को AT-1 बॉन्ड बेचने की प्रथा पर भी चिंता जताई। जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि इस तरह के जोखिम भरे वित्तीय साधनों की बिक्री के मामले में अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत थी। अदालत ने RBI के नियामकीय ढांचे का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे हाई-रिस्क वित्तीय साधन संस्थागत निवेशकों के लिए बनाए गए थे। इसके बावजूद, यस बैंक ने कथित तौर पर व्यक्तिगत निवेशकों को ये बॉन्ड बेचने में न केवल अनुमति दी, बल्कि खुद भी सक्रिय भूमिका निभाई। सुनवाई के दौरान भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के हलफनामे का भी उल्लेख किया गया। SEBI ने कहा था कि BSE और NSE के प्लेटफॉर्म पर कारोबार किए जाने वाले बॉन्ड उसके नियमों का पालन करते हैं। नियामक ने एक निजी वेल्थ मैनेजमेंट फर्म और यस बैंक के तत्कालीन मैनेजिंग डायरेक्टर पर व्यक्तिगत निवेशकों को ऐसे बॉन्ड बेचने में मदद करने के लिए जुर्माना भी लगाया था।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यस बैंक की ओर से व्यक्तिगत निवेशकों को सीधे बेचे गए बॉन्ड SEBI के नियमों के दायरे में नहीं आते थे। इस पहलू ने बॉन्ड की बिक्री और निवेशकों को दी गई जानकारी से जुड़े सवालों को और गंभीर बना दिया। कोर्ट ने 28 दिसंबर 2016 के एक ईमेल का भी जिक्र किया, जिसे मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने रिकॉर्ड पर रखा था। अदालत के अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि यह ईमेल चेन्नई में यस बैंक के एक सीनियर मैनेजर-फाइनेंशियल एडवाइजर ने भेजा था। इसमें व्यक्तिगत निवेशकों को बॉन्ड खरीदने का प्रस्ताव दिया गया था।
अदालत ने कहा कि इतने जोखिम वाले वित्तीय उत्पादों की ओर व्यक्तिगत निवेशकों को आकर्षित करने से पहले कहीं अधिक सख्त जांच-पड़ताल होनी चाहिए थी। निवेशकों को जोखिम की पर्याप्त जानकारी देना और बिक्री के दौरान नियमों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी था। इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि अंतिम पुनर्गठन योजना लागू होने के बाद प्रशासक को AT-1 बॉन्ड राइट-डाउन करने का अधिकार नहीं था और नियामकीय तथा प्रशासनिक खामियों का बोझ निवेशकों पर नहीं डाला जा सकता।

