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Mullana Government School News: मुलाना के सरकारी स्कूल में 'बचपन' पर बोझ: कलम की जगह बच्चों के कंधों पर लदे गैस सिलेंडर

AAmandeep Singh
मुलाना के सरकारी स्कूल में 'बचपन' पर बोझ: कलम की जगह बच्चों के कंधों पर लदे गैस सिलेंडर
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अंबाला। कहते हैं कि स्कूल ‘शिक्षा का मंदिर’ होता है, जहाँ बच्चों का भविष्य गढ़ा जाता है। लेकिन अंबाला के मुलाना स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे भविष्य गढ़ने की नहीं बल्कि बचपन को कुचलने की गवाही दे रही हैं। यहाँ मासूम छात्रों से वह काम कराया जा रहा है, जिसे करना चपरासी या मिड-डे मील स्टाफ की जिम्मेदारी है। वायरल वीडियो ने शिक्षा विभाग के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें बच्चों की सुरक्षा और गरिमा की बात कही जाती है।

क्षमता से बाहर का काम और मूकदर्शक बना प्रशासन

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वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे छोटी उम्र के बच्चे अपनी शारीरिक क्षमता से कहीं ज्यादा भारी गैस सिलेंडरों को घसीट रहे हैं और अपने कंधों पर उठा रहे हैं। रोंगटे खड़े कर देने वाली बात यह है कि इस जोखिम भरे काम के दौरान स्कूल का स्टाफ पास ही खड़ा नजर आ रहा है, लेकिन किसी ने भी उन मासूमों को रोकने की जहमत नहीं उठाई। सिलेंडर से होने वाली किसी भी संभावित दुर्घटना की आशंका को दरकिनार कर बच्चों का जिस तरह ‘मजदूर’ के रूप में इस्तेमाल किया गया, उसने अभिभावकों के मन में डर पैदा कर दिया है।

शिक्षा विभाग का हंटर: प्रिंसिपल को कारण बताओ नोटिस

मामले ने जैसे ही तूल पकड़ा, जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी (DEEO) तुरंत हरकत में आ गए। अधिकारियों ने वीडियो का संज्ञान लेते हुए खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) को मौके पर जांच के निर्देश दिए हैं। विभाग ने स्कूल के प्रिंसिपल को आधिकारिक पत्र जारी कर दो दिन के भीतर स्पष्टीकरण देने को कहा है। प्रारंभिक पूछताछ में स्कूल प्रशासन ने अपनी गलती तो मान ली है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ गलती मान लेना ही काफी है?

“सुरक्षा सर्वोपरि, लापरवाही बर्दाश्त नहीं”

DEEO ने कड़े शब्दों में कहा है कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। विभाग ने एक सामान्य आदेश जारी कर जिले के सभी स्कूलों के मुखियाओं को सचेत किया है कि बच्चों से उनकी पढ़ाई के अलावा कोई भी बाहरी या शारीरिक श्रम वाला काम न कराया जाए। मुलाना के मामले में लिखित जवाब मिलने के बाद विभागीय जांच की जाएगी और यदि जवाब संतोषजनक नहीं मिला, तो जिम्मेदारों पर गाज गिरना तय है।

यह मामला एक बार फिर उन बुनियादी कमियों को उजागर करता है, जहाँ चपरासी और अन्य सहायक स्टाफ होने के बावजूद छोटे बच्चों को निजी स्वार्थ या आलस्य के चलते जोखिम में डाल दिया जाता है। अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग इस मामले में क्या नजीर पेश करता है।

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