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Karan Organ Donation: जाते-जाते दो जिंदगियां रोशन कर गया 20 साल का करण; पीजीआई में हुआ सफल अंगदान

GGaganpreet Kaur
जाते-जाते दो जिंदगियां रोशन कर गया 20 साल का करण; पीजीआई में हुआ सफल अंगदान
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अंबाला । अंबाला शहर के रामदास नगर का रहने वाला करण अपनी आंखों में भविष्य के कई सपने संजोए हुए था। 12वीं कक्षा में पढ़ रहे करण की पूरी जिंदगी उसके सामने थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। बीते 28 अप्रैल 2026 को सड़क पार करते समय एक तेज रफ्तार कार ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। गंभीर हालत में उसे पहले अंबाला के सिविल अस्पताल और फिर वहां से चंडीगढ़ सेक्टर-32 रेफर किया गया। अंततः उसे बेहतर इलाज के लिए पीजीआई लाया गया। डॉक्टरों की हर मुमकिन कोशिश के बाद भी करण की स्थिति में सुधार नहीं हुआ और 7 मई 2026 को ब्रेन स्टेम डेथ कमेटी ने उसे ‘ब्रेन डेड’ घोषित कर दिया।

“करण का एक हिस्सा हमेशा जिंदा रहेगा”

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जब डॉक्टरों ने परिवार को करण की स्थिति के बारे में बताया, तो जैसे उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन इस असहनीय पीड़ा के बीच करण के बड़े भाई सुनील कुमार और पिता मोहन लाल ने जो हौसला दिखाया, उसने डॉक्टरों को भी प्रभावित किया। सुनील ने नम आंखों से कहा, “करण बहुत जिंदादिल था, उसकी पूरी उम्र बाकी थी। उसे खोने का दर्द कभी कम नहीं होगा, पर यह सोचकर दिल को तसल्ली मिलती है कि वह किसी और की सांसों में धड़केगा। हमने चाहा कि वह जाते-जाते भी किसी के काम आए।”

दो मरीजों को मिला जीवनदान

परिवार की रजामंदी मिलते ही पीजीआई की मल्टी-डिसिप्लिनरी टीमों ने सक्रियता दिखाई। करण का लीवर एक 22 वर्षीय युवक को ट्रांसप्लांट किया गया, जो लिवर की अंतिम अवस्था की बीमारी (End-stage liver disease) से लड़ रहा था। वहीं, उसकी पैंक्रियाज और एक किडनी 35 वर्षीय महिला को दी गई, जो लंबे समय से ऑर्गन फेल्योर और उससे जुड़ी जटिलताओं से त्रस्त थी। हालांकि परिवार ने फेफड़े दान करने की भी इच्छा जताई थी, लेकिन मेडिकल जांच में वे प्रत्यारोपण के योग्य नहीं पाए गए। पीजीआई प्रशासन और डॉक्टरों ने करण के परिवार के इस निस्वार्थ त्याग की सराहना की है। जानकारों का कहना है कि भारत में अंगदान की दर अभी भी बहुत कम है, ऐसे में अंबाला के इस परिवार का निर्णय हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

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