सिनेमा के पर्दे पर देश के लिए जान न्योछावर करने वाले सैनिकों और पुलिसकर्मियों की कहानियां तो हमने कई बार देखी हैं, लेकिन संकट की उस घड़ी में अस्पताल के भीतर सफेद एप्रन पहने जिन नर्सेस ने ढाल बनकर गोलियों का सामना किया, उन्हें अक्सर भुला दिया गया। निर्देशक ने ‘भारत भाग्य विधाता’ के जरिए उन्हीं अनकहे नायकों की जांबाजी को सलाम किया है। फिल्म की शुरुआत 26/11 के खौफनाक मंजर के कुछ दिनों बाद से होती है, जहां कामा अस्पताल हमले की इकलौती गवाह नर्स गीता गांधारे (कंगना रनौत) पुलिस के पास अपना बयान दर्ज कराने पहुंचती है। यहीं से कहानी फ्लैशबैक में जाती है और उस खूनी रात के पन्ने एक-एक कर खुलने लगते हैं।
जब पटाखों की आवाज समझकर नर्सों ने सुनी थी गोलियों की गूंज
फिल्म का पहला हिस्सा कामा अस्पताल के रोजमर्रा के माहौल और वहां काम करने वाली नर्सों— गीता, तृप्ति, शीतल, बबीता और मोहिनी के आपसी रिश्तों को स्थापित करने में समय लेता है। अस्पताल में आम दिनों की तरह ही मरीजों की सेवा हो रही होती है कि अचानक बाहर गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजती है। शुरुआत में स्टाफ इसे शादी-ब्याह के पटाखे समझकर नजरअंदाज कर देता है, लेकिन जल्द ही यह साफ हो जाता है कि मौत साए की तरह अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ रही है। अजमल कसाब और अबू इस्माइल जैसे खूंखार आतंकियों के सामने बिना किसी हथियार के खड़ी ये निहत्थी महिलाएं कैसे 300 से ज्यादा मरीजों और एनआईसीयू में वेंटिलेटर पर सांसे ले रहे नवजात बच्चों की जान बचाती हैं, यही फिल्म का मुख्य आधार है।
क्या हैं फिल्म की सबसे बड़ी ताकतें?
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका नेक इरादा और प्रासंगिक संदेश है। यह दिखाती है कि बहादुरी सिर्फ बंदूक थामने से नहीं, बल्कि दूसरों की जान बचाने के जज्बे से पैदा होती है। कंगना रनौत ने एक गंभीर महाराष्ट्रीयन नर्स के रूप में अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करने की कोशिश की है, खासकर संकट के दृश्यों में उनकी आंखों का खौफ और संकल्प देखने लायक है। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के तनाव को बढ़ाने में पूरी मदद करता है। सहयोगी कलाकारों में स्मिता तांबे और रसिका आगाशे की अदाकारी बेहद स्वाभाविक है। डायरेक्टर ने फिल्म को बेवजह के कमर्शियल मसालों और गानों से दूर रखकर इसकी सादगी और गंभीरता को बनाए रखा है, जिससे इंटरवल के बाद का ड्रामा काफी कड़क लगता है।
कहां रह गई कमियां और चूक?
सहानुभूति और बेहतरीन विषय के बावजूद तकनीकी मोर्चे पर फिल्म थोड़ी लड़खड़ाती है। कंगना रनौत कई दृश्यों में महाराष्ट्रीयन लहजे (एक्सेंट) को पूरी तरह पकड़ नहीं पाई हैं, जिससे उनका संवाद कभी-कभी कृत्रिम लगने लगता है। स्क्रीनप्ले में कई जगह ठहराव आ जाता है, जिससे थ्रिलर फिल्म की जरूरी रफ्तार धीमी पड़ जाती है। मुख्य किरदारों के निजी जीवन और उनके अतीत को बहुत सतही तौर पर दिखाया गया है, जिसके कारण दर्शक उनसे पूरी तरह भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते। कुछ दृश्य बार-बार दोहराए गए से लगते हैं और फिल्म कई जगह किसी डॉक्यूमेंट्री या टेक्स्टबुक की तरह सीधी सपाट हो जाती है। सिनेमाई नजरिए से इसमें उस कसे हुए निर्देशन की कमी खलती है, जो ऐसी कहानियों के लिए बेहद जरूरी है।
अंतिम फैसला: टिकट खिड़की पर पैसे लगाएं या नहीं?
‘भारत भाग्य विधाता’ एक ऐसी फिल्म है जिसे सिनेमाई कमियों के बावजूद इसके विषय और नीयत के लिए देखा जाना चाहिए। अगर आप देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्में देखना पसंद करते हैं, 26/11 के इतिहास के इस अनसुने पन्ने से रूबरू होना चाहते हैं और कंगना रनौत के संजीदा अभिनय के मुरीद हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है। अस्पताल के भीतर बच्चों को बचाने वाले इमोशनल सीन निश्चित रूप से आपकी आंखें नम कर देंगे। इसके उलट, यदि आप हॉलीवुड स्टाइल की एक बेहद तेज रफ्तार, मुकम्मल और बिना किसी झोल वाली सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं, तो शायद इसकी धीमी गति आपको थोड़ा निराश कर सकती है।

