पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय ‘एक बोने दुई बाघ थाके ना’ (एक जंगल में दो शेर नहीं रह सकते) वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी एक बार फिर चुनावी दंगल में आमने-सामने हैं। इस बार रणभूमि नंदीग्राम नहीं, बल्कि ममता दीदी का अपना क्षेत्र भवानीपुर है। शुभेंदु अधिकारी ने हुंकार भरते हुए कहा है कि वह ममता बनर्जी को कम से कम 25 हजार वोटों के अंतर से हराएंगे। यह चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 2021 में शुभेंदु ने नंदीग्राम में दीदी को 1,956 वोटों से शिकस्त देकर सबको चौंका दिया था।
दक्षिण कोलकाता की ‘हॉट सीट’ का सामाजिक गणित
भवानीपुर विधानसभा सीट सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि कोलकाता की समृद्धि और संस्कृति का प्रतीक है। दक्षिण कोलकाता लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाले इस इलाके में कालीघाट मंदिर का ऐतिहासिक प्रवेश द्वार है। यहाँ का जनसांख्यिकीय समीकरण काफी दिलचस्प है, क्योंकि यहाँ लगभग 70 प्रतिशत आबादी गैर-बंगाली है। इनमें गुजराती, मारवाड़ी और बिहार से आकर बसे लोगों की बड़ी तादाद है। शुभेंदु अधिकारी इन्हीं वोटर्स के भरोसे ममता बनर्जी के वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं।
‘डबल ट्रैप’ में फंसीं ममता बनर्जी?
ममता बनर्जी के लिए यह मुकाबला सिर्फ भाजपा से नहीं है। टीएमसी से बर्खास्त किए गए हुमायूं कबीर की ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ ने यहाँ से पूनम बेगम को प्रत्याशी बनाकर दीदी की राह मुश्किल कर दी है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह ‘त्रिकोणीय’ मुकाबला टीएमसी के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है। पश्चिम बंगाल में बहुमत के लिए 148 सीटों की दरकार है, लेकिन भवानीपुर की यह एक सीट मनोवैज्ञानिक तौर पर पूरे बंगाल का मूड तय करने वाली साबित होगी।
इतिहास और शख्सियतों का गढ़
भवानीपुर का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। 20वीं सदी की शुरुआत में कोलकाता के रईस व्यापारियों और वकीलों ने इसे आधुनिक उपनगर के रूप में विकसित किया था। यह क्षेत्र नेताजी सुभाष चंद्र बोस, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सत्यजीत रे जैसी महान विभूतियों से जुड़ा रहा है। राजनीतिक इतिहास देखें तो 1951 में गठन के बाद यहाँ 12 चुनाव हुए हैं। लंबे समय तक कांग्रेस का कब्जा रहने के बाद पिछले कुछ वर्षों से यहाँ टीएमसी का झंडा बुलंद है, जिसे उखाड़ने के लिए भाजपा ने ‘दुखती नब्ज’ पर हाथ रखा है।

