भिवानी। भिवानी जिले के छोटे से गांव लालावास के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले 22 वर्षीय अतुल भारद्वाज आज उन हजारों युवाओं के लिए मिसाल बन गए हैं, जो महंगी कोचिंग के अभाव में अपने सपनों को दम तोड़ते देख लेते हैं। अतुल ने कर्मचारी चयन आयोग की सीजीएल परीक्षा में न केवल सफलता हासिल की, बल्कि पहले ही प्रयास में सुपरिटेंडेंट जैसा प्रतिष्ठित पद झटक लिया। उनकी इस उपलब्धि से पूरे इलाके में खुशी की लहर है और उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है।
शिक्षित परिवार और लगन का संगम
अतुल की इस सफलता की नींव उनके घर के शैक्षणिक माहौल में ही छिपी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिवाजी कॉलेज से इकोनॉमिक्स ऑनर्स करने वाले अतुल के पिता पवन शर्मा भले ही ट्रांसपोर्ट का काम करते हों, लेकिन उन्होंने बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। अतुल की दोनों बड़ी बहनें पोस्ट ग्रेजुएट हैं, वहीं उनके चाचा सोमबीर शर्मा रक्षा मंत्रालय में सीनियर ट्रांसलेटर के पद पर तैनात हैं। परिवार के इसी माहौल ने अतुल को बचपन से ही कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित किया।
8 घंटे की सेल्फ स्टडी और स्पष्ट लक्ष्य
अपनी तैयारी के बारे में बात करते हुए अतुल ने बताया कि उन्होंने कभी कोचिंग सेंटर का रुख नहीं किया। उनका मानना है कि सही रणनीति और इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों का अगर सही इस्तेमाल किया जाए, तो सेल्फ स्टडी ही सबसे बड़ा हथियार है। अतुल रोजाना करीब 8 घंटे पूरी एकाग्रता के साथ पढ़ते थे। दिलचस्प बात यह है कि सीजीएल से पहले भी अतुल दो सरकारी परीक्षाएं पास कर चुके थे, लेकिन उनका लक्ष्य शुरू से ही क्लास-बी गैजेटेड ऑफिसर का पद था, जिसे उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से हासिल कर लिया।
युवाओं के लिए प्रेरणा: कोचिंग नहीं, मेहनत है चाबी
अतुल की सफलता उन छात्रों के लिए एक बड़ा संदेश है जो यह मानते हैं कि बिना दिल्ली या चंडीगढ़ की बड़ी कोचिंग के सरकारी नौकरी पाना असंभव है। अतुल ने साबित किया कि सीमित साधनों के बावजूद अगर अभ्यास (Practice) निरंतर रखा जाए, तो मंजिल मिल ही जाती है। आज भिवानी के इस युवा ने न केवल अपने गांव लालावास का मान बढ़ाया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि हरियाणा की मिट्टी के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।

