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Bhiwani Mandi Mustard News: भिवानी मंडी में सरसों खरीद पर बवाल: निजी लैब की रिपोर्ट पर भड़के किसान, लगाया धांधली का आरोप

AAmandeep Singh
भिवानी मंडी में सरसों खरीद पर बवाल: निजी लैब की रिपोर्ट पर भड़के किसान, लगाया धांधली का आरोप
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भिवानी। हरियाणा की प्रमुख मंडियों में शुमार भिवानी की नई अनाज मंडी इन दिनों सरसों की पीली रंगत से सराबोर है, लेकिन इस चमक के पीछे किसानों का आक्रोश भी उबल रहा है। विवाद की जड़ में है वह ‘प्राइवेट लैब’ जिसे सरसों की गुणवत्ता और उसमें तेल की मात्रा जांचने का जिम्मा सौंपा गया है। मंडी पहुंचे किसानों का सीधा आरोप है कि लैब की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है और जानबूझकर उनकी मेहनत की फसल को कमतर आंका जा रहा है। अन्नदाता का कहना है कि यह खेल उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए रचा जा रहा है।

“एक ही ढेरी, दो नतीजे”: लैब की साख पर उठे गंभीर सवाल

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मंडी में अपनी फसल लेकर पहुंचे कई किसानों ने जो आपबीती सुनाई, वह हैरान करने वाली है। एक किसान ने दावा किया कि उसने अपनी एक ही ट्राली से दो अलग-अलग सैंपल जांच के लिए दिए, लेकिन दोनों की रिपोर्ट में जमीन-आसमान का अंतर पाया गया। किसानों का वाजिब सवाल है कि “जब खेत एक है, फसल एक है, तो गुणवत्ता में इतना बड़ा फेरबदल कैसे संभव है?” इसी तकनीकी विसंगति के चलते किसानों को वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नहीं मिल पा रहा, जिसके वे हकदार हैं। इस अविश्वास ने मंडी के माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है।

“निजी लैब नहीं, सरकारी मुहर चाहिए”: निष्पक्ष जांच की उठी मांग

किसानों के बढ़ते अविश्वास को देखते हुए अब यह मांग तेज हो गई है कि सरसों की जांच निजी कंपनियों के बजाय सरकारी लैब के माध्यम से कराई जाए। किसानों का तर्क है कि निजी कंपनियां अक्सर बड़े व्यापारियों और मिल मालिकों के हितों को ध्यान में रखकर रिपोर्ट तैयार करती हैं। किसानों का कहना है कि यदि सरकारी अधिकारी और सरकारी उपकरण इस प्रक्रिया का हिस्सा होंगे, तो जांच की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठेंगे। मंडी के आढ़तियों ने भी दबी जुबान में स्वीकार किया है कि वर्तमान व्यवस्था से किसान और प्रशासन के बीच अविश्वास की खाई और चौड़ी हो रही है।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती: क्या पटरी पर लौटेगी खरीद?

फिलहाल मंडी में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है, लेकिन किसान संगठनों ने दो-टूक चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही गुणवत्ता जांच की व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया और सरकारी लैब को सक्रिय नहीं किया गया, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। सरसों की बंपर आवक के बीच इस विवाद का लंबा खिंचना न केवल खरीद की गति को धीमा कर सकता है, बल्कि सरकार की साख पर भी सवाल खड़े कर सकता है। अब सबकी नजरें हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड और जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं—क्या वे किसानों का भरोसा बहाल कर पाएंगे?

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