Delhi Protest Case: दिल्ली में हालिया विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 की संवैधानिक वैधता की जांच करने से इनकार कर दिया। यह प्रावधान पहले लागू दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 के समान है। इसके तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए निषेधाज्ञा जारी कर सकते हैं। 15 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 1961 के बाबूलाल पराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में CrPC की धारा 144 की वैधता को पहले ही बरकरार रख चुका है। इसी आधार पर पीठ ने BNSS की धारा 163 को चुनौती देने वाले पक्षों की दलीलों पर विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने BNSS की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने केंद्र को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। आदेश के अनुसार, इस सीमित मुद्दे पर जवाब 19 नवंबर 2026 तक देना है।
धारा 172 में क्या प्रावधान है, याचिकाकर्ताओं को किस बात पर आपत्ति?
BNSS की धारा 172 पुलिस अधिकारियों के कानूनी निर्देशों का पालन करने से संबंधित है। इसकी उपधारा (1) के तहत लोगों को पुलिस अधिकारी के कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान दिए गए कानूनी निर्देशों का पालन करना होता है। वहीं, उपधारा (2) पुलिस अधिकारी को निर्देशों का विरोध करने, उन्हें मानने से इनकार करने या उनकी अनदेखी करने वाले व्यक्ति को हिरासत में लेने अथवा वहां से हटाने का अधिकार देती है। प्रावधान के तहत ऐसे व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जा सकता है। छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर रिहा करने का प्रावधान भी बताया गया है। यह धारा BNSS के उस अध्याय का हिस्सा है, जो पुलिस की निवारक कार्रवाई से संबंधित है।
याचिकाकर्ताओं ने इस प्रावधान पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे पुलिस अधिकारी को अपने आकलन के आधार पर किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का व्यापक अधिकार मिल सकता है। याचिका में तर्क दिया गया कि हिरासत के लिए संज्ञेय अपराध की उचित आशंका, लिखित कारण दर्ज करने या न्यायिक जांच जैसे पर्याप्त सुरक्षा उपाय स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं किए गए हैं। याचिका में अदालत से धारा 172 को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन के आधार पर असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 19 नागरिकों की कुछ मौलिक स्वतंत्रताओं और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है। इन दलीलों पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़ा है मामला, डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश
यह मामला 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में आयोजित किया गया था। याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि छात्रों, कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं समेत बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया या प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोका गया। कुछ लोगों को प्रदर्शन स्थल से दूर रोके जाने और कुछ को ट्रेन से उतारे जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और वकीलों के साथ कथित पुलिस ज्यादती, सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़े अवमानना मामले और BNSS के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता से संबंधित याचिकाएं भी हैं। अदालत ने BNSS की धारा 163 के तहत जारी आदेशों की वैधता को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई 19 नवंबर तक टाल दी।
अदालत ने केंद्र सरकार को नई दिल्ली में धारा 163 के तहत जारी आदेश रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश भी दिया। इनमें 23 अगस्त 2026 का आदेश शामिल है। इसके अलावा, सभी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्रदर्शन से जुड़े CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने को कहा गया है। जिन निजी पक्षों के पास ऐसी सामग्री है, उन्हें भी उसे अदालत के सामने पेश करने की अनुमति दी गई है। अब मामले में धारा 172 की संवैधानिक वैधता पर केंद्र सरकार का जवाब और धारा 163 के तहत जारी आदेशों से संबंधित रिकॉर्ड आगे की सुनवाई में अहम होंगे। अभिजीत दीपके गिरफ्तार, आज SEM कोर्ट में पेशी; तिरंगा रैली से पहले लिया गया था हिरासत में

