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Faridabad Gas Shortage: फरीदाबाद में गैस संकट का 'साइड इफेक्ट': सिलेंडर की किल्लत ने फिर सुलगाए रसोइयों में चूल्हे

AAmandeep Singh
फरीदाबाद में गैस संकट का 'साइड इफेक्ट': सिलेंडर की किल्लत ने फिर सुलगाए रसोइयों में चूल्हे
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फरीदाबाद। कहते हैं वक्त का पहिया घूमकर फिर वहीं आ जाता है, और फरीदाबाद की गलियों में इन दिनों यह कहावत सच साबित हो रही है। जिस ‘धुआं मुक्त रसोई’ का सपना हम देख रहे थे, वह गैस की किल्लत और बढ़ते दामों की भेंट चढ़ता दिख रहा है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच मचे वैश्विक घमासान ने फरीदाबाद की रसोइयों की तस्वीर बदल दी है। शहर में गैस सिलेंडर मिलना अब किसी सरकारी दफ्तर के चक्कर काटने जैसा दुरूह कार्य हो गया है। घंटों लाइनों में लगने के बावजूद जब हाथ खाली रह जाते हैं, तो लोग थक-हारकर लकड़ी और कोयले की ओर रुख कर रहे हैं।

40% बढ़ी कोयला-लकड़ी की बिक्री, पुराने दिनों की हुई वापसी

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औद्योगिक नगरी फरीदाबाद में पिछले कुछ हफ्तों के भीतर कोयला और लकड़ी के व्यापार में अचानक 40 प्रतिशत तक का उछाल देखा गया है। जो लोग कभी गैस बर्नर की नीली लौ पर खाना बनाने के आदी हो चुके थे, वे अब दुकानों पर लकड़ी के गट्ठर और कोयले की बोरियां लादते नजर आ रहे हैं। लकड़ी विक्रेताओं की मानें तो सालों बाद ऐसे दिन लौटे हैं जब सुबह से शाम तक ग्राहकों का तांता लगा रहता है। यह बदलाव शौक नहीं, बल्कि एक कड़वी मजबूरी है, क्योंकि गैस के दाम अब आम आदमी की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं।

ढाबे और रेस्टोरेंट बेहाल: कमर्शियल सिलेंडर बना ‘दुर्लभ वस्तु’

गैस संकट की सबसे मारक चोट छोटे व्यापारियों, खासकर ढाबे और रेस्टोरेंट संचालकों पर पड़ी है। कमर्शियल सिलेंडर की ब्लैक मार्केटिंग और सीमित सप्लाई ने इनके चूल्हों को ठंडा कर दिया है। कई ढाबा संचालकों का कहना है कि महंगा सिलेंडर खरीदकर खाना बेचना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। ऐसे में वे वापस पुराने तंदूर और कोयले की भट्ठियों की शरण में हैं। इसका सीधा असर खाने के स्वाद और ग्राहकों की जेब पर भी पड़ रहा है, क्योंकि कोयले पर खाना बनाने में समय और मेहनत दोनों ज्यादा लगती है।

आसमान छूती कीमतें और खाली हाथ लौटती जनता

गैस एजेंसियों के बाहर सुबह चार बजे से ही कतारें लगनी शुरू हो जाती हैं, लेकिन दोपहर होते-होते ‘स्टॉक खत्म’ का बोर्ड लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर देता है। ऊपर से अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के नाम पर गैस के दामों में जो इजाफा हुआ है, उसने मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट की चूलें हिला दी हैं। फरीदाबाद के निवासी अब खुद को उस दौर में खड़ा पा रहे हैं जहाँ ईंधन के लिए उन्हें फिर से वही जद्दोजहद करनी पड़ रही है जो दशकों पहले हुआ करती थी। प्रशासन और सरकार के दावे फिलहाल इस जमीनी हकीकत के आगे बौने साबित हो रहे हैं।

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