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छात्र असंतोष की गूंज जंतर-मंतर से गांवों तक, अब ‘जेन अल्फा’ भी उठा रहा शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

छात्र असंतोष की गूंज जंतर-मंतर से गांवों तक, अब ‘जेन अल्फा’ भी उठा रहा शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

छात्र असंतोष की गूंज जंतर-मंतर से गांवों तक

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Gen Alpha Performance: जून-जुलाई में जंतर-मंतर से शुरू हुई छात्रों के असंतोष की आवाजें अब दूरदराज के उन गांवों और कस्बों तक पहुंच गयी है, जो देश के शिक्षा मानचित्र पर अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इस आंदोलन में अब केवल ‘जेन जी’ ही नहीं, बल्कि ‘जेन अल्फा’ भी शामिल हो गया है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में कथित भ्रष्टाचार को लेकर जून-जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में हुए आंदोलन के बाद अब कम उम्र के सैकड़ों स्कूली छात्र अपनी समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। कहीं स्कूलों में पंखे नहीं हैं, कहीं शौचालय नहीं, कहीं शिक्षक नहीं और कहीं बुनियादी ढांचा तक नहीं है। कुछ जगहों पर तो बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल की उचित इमारत तक नहीं है। भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में ‘जेन अल्फा’ यानी 2010 से 2024 के बीच जन्मे बच्चे अपने पढ़ाई के माहौल को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी खुद उठाते नजर आ रहे हैं।

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश से ऐसी खबरें सामने आई हैं, जहां विपरीत परिस्थितियों के बावजूद छात्र अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं और उन समस्याओं को सामने ला रहे हैं, जो उनके जीवन और पढ़ाई से सीधे जुड़ी हैं। पिछले सप्ताह राजस्थान में जयपुर के एक गांव के प्राथमिक विद्यालय से आई खबर इस छात्र आंदोलन की बड़ी सफलता के रूप में सामने आई। यहां बच्चे मवेशियों के बाड़े में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर थे। रामपुरा कनवारपुरा गांव के स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे कॉजपा के सदस्यों और कुछ ग्रामीणों के बीच विवाद के बाद राज्य सरकार ने स्कूल के लिए नयी इमारत बनाने की घोषणा की। सरकार ने स्वीकार किया कि रामपुरा स्कूल की इमारत को सितंबर 2025 में जर्जर घोषित कर दिया गया था और तब से बच्चों की कक्षाएं मवेशियों के बाड़े में लगाई जा रही थीं।

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सरकार की घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए कॉजपा के सह-संस्थापक और प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा कि रामपुरा स्कूल को लेकर पार्टी की तत्काल मांग पूरी हो गई है, लेकिन सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति के खिलाफ उसका अभियान जारी रहेगा। रांका ने कहा, ‘‘हम वहां वोट मांगने नहीं गए थे। हम स्कूल की हालत ठीक कराने की बात करने गए थे। अब सरकार ने एक सितंबर से काम शुरू करने की मंजूरी दे दी है, इसलिए यह मुद्दा अब खत्म हो गया है।’’ स्कूल का यह निरीक्षण कॉजपा के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का हिस्सा था। यह अभियान हैदराबाद, तेलंगाना, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों में बेहतर बुनियादी ढांचा और पर्याप्त शिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग करना है। इस अभियान से जुड़ी छोटी-बड़ी कई सफलताएं सामने आई हैं।

राजस्थान के अजमेर के एक सरकारी स्कूल की छात्राओं ने 17 अगस्त को प्रधानाचार्य के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्राओं ने प्रधानाचार्य पर कथित रूप से उनके साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया। छात्राओं और उनके अभिभावकों ने प्रधानाचार्य के चेहरे पर कालिख पोती और उसकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। पुलिस ने कहा कि आरोपी के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया जाएगा। इससे पहले पांच अगस्त को जयपुर के सरकारी आनंदीलाल पोद्दार वरिष्ठ माध्यमिक बधिर विद्यालय के सुनने और बोलने में असमर्थ छात्रों ने खराब बुनियादी ढांचे और आवश्यक सुविधाओं की कमी को लेकर प्रदर्शन किया था। छात्र स्कूल से बाहर निकलकर धरने पर बैठ गए। उन्होंने सांकेतिक भाषा के माध्यम से बताया कि गंदे शौचालय, पीने के पानी की कमी और जर्जर स्कूल भवन के कारण उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। छात्रों का कहना था कि स्कूल प्रशासन से बार-बार शिकायत करने के बावजूद उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया।

इसके बाद शिक्षा विभाग ने स्कूल के प्रधानाचार्य को हटा दिया। छात्रों के बढ़ते विरोध प्रदर्शनों पर शिक्षाविद् और दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के पूर्व प्रोफेसर प्रभु महापात्र ने कहा कि ये घटनाएं इस बात को दर्शाती हैं कि शिक्षा नीति बनाते समय छात्रों को महत्वपूर्ण हितधारक के रूप में पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। महापात्र ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ये विरोध प्रदर्शन शिक्षा के लिए घटती प्राथमिकता को भी दर्शाते हैं। गिरावट केवल बुनियादी ढांचे में ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की उपलब्धता और शिक्षा की गुणवत्ता में भी दिखाई देती है। यह समस्या खासतौर पर उत्तर और पूर्वी भारत में अधिक स्पष्ट हो गई है।’’ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 21 अगस्त को 36 जिलों से आए ‘जेन अल्फा’ और ‘जेन जी’ छात्रों तथा शिक्षकों ने प्रदर्शन किया। उन्होंने जर्जर स्कूल भवनों और राज्य में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों को बंद किए जाने के खिलाफ आवाज उठाई।

भोपाल के नीलम पार्क में छात्रों और शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि राज्य में 25,000 से अधिक स्कूल बंद हो चुके हैं। उन्होंने ‘स्कूल बचाओ’ आंदोलन को और तेज करने की घोषणा की तथा अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी दी। पिछले कुछ सप्ताह से उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में भी स्कूली छात्रों के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। छात्र हाथों में पोस्टर और तख्तियां लेकर सड़कों पर उतरे और कई शहरों में प्रमुख चौराहों पर यातायात रोक दिया। फतेहपुर, हमीरपुर और कन्नौज में हुए इन प्रदर्शनों ने सोशल मीडिया और समाचार सुर्खियों में जगह बनाई। लखनऊ के जय प्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय के छात्रों ने 14 अगस्त को शिक्षकों की कमी के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों ने कुछ समय के लिए सड़क पर यातायात भी रोक दिया।

पुलिस प्रशासन और राज्य के मंत्री असीम अरुण के उनकी शिकायतें सुनने पर सहमत होने के बाद छात्र स्कूल लौट गए। लेकिन यह समझौता ज्यादा दिन नहीं चला। तीन दिन बाद छात्राओं ने उन्हीं मांगों को लेकर दोबारा सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया। भारी बारिश भी उनका हौसला नहीं तोड़ सकी। छात्राओं ने शहर की दो सड़कों को अवरुद्ध कर दिया और हाथों में पोस्टर-बैनर लेकर विभिन्न समस्याओं के खिलाफ नारे लगाए। एक छात्रा अनामिका ने आरोप लगाया कि स्कूल में विज्ञान वर्ग के छात्रों की संख्या काफी अधिक होने के बावजूद वहां रसायन विज्ञान के सिर्फ एक शिक्षक हैं और भौतिक विज्ञान तथा जीव विज्ञान के शिक्षक हैं ही नहीं। उन्होंने गुस्से में पत्रकारों से कहा, ‘‘बोर्ड परीक्षाएं नजदीक हैं, लेकिन शिक्षक नहीं होने के कारण पढ़ाई प्रभावित हो रही है। छात्रों को ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होने में भी परेशानी हो रही है।’’

लखनऊ से सटे उन्नाव में भी 19 अगस्त को एक सरकारी आवासीय विद्यालय के सैकड़ों छात्रों ने प्रदर्शन किया। उन्होंने खराब गुणवत्ता वाले भोजन, पीने के पानी की कमी, शिक्षकों की कमी और प्रधानाचार्य के व्यवहार को लेकर शिकायत की। प्रशासनिक अधिकारियों ने छात्रों को उनकी समस्याओं का समाधान करने का आश्वासन दिया, जिसके बाद उन्होंने प्रदर्शन समाप्त कर दिया। जंतर-मंतर पर 28 जुलाई को हुए तनावपूर्ण प्रदर्शन के समाप्त होने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के महज तीन दिन बाद, उत्तर प्रदेश के किशनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज के छठी से लेकर 12वीं कक्षा तक के करीब 1,800 छात्रों ने प्रदर्शन किया। छात्रों ने आरोप लगाया कि स्कूल में स्वच्छ पेयजल, साफ शौचालय, बिजली, पंखे, पर्याप्त फर्नीचर, कंप्यूटर लैब, पुस्तकालय और खेल सुविधाएं नहीं हैं।

उन्होंने स्कूल प्रशासन पर दाखिले के दौरान कथित रूप से अनधिकृत तरीके से पैसे लेने और अंकपत्र तथा अन्य दस्तावेज जारी करने के लिए भी पैसे मांगने का आरोप लगाया। इसके बाद जिला विद्यालय निरीक्षक राकेश कुमार स्कूल पहुंचे और छात्रों से बातचीत की। उन्होंने लिखित आश्वासन दिया कि लंबित समस्याओं पर 24 घंटे के भीतर काम शुरू किया जाएगा, जिसके बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ। महापात्र के अनुसार, इन प्रदर्शनों का महत्व केवल अलग-अलग छात्रों की शिकायतों तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि ये प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि युवा अब सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गिरती स्थिति को चुपचाप स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। कॉजपा के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान की तर्ज पर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने भी अगले तीन महीनों के लिए देशव्यापी ‘स्कूल बचाओ आंदोलन’ शुरू करने की घोषणा की है। एसएफआई का कहना है कि इस अभियान के जरिए सरकारी स्कूलों की बिगड़ती स्थिति को सामने लाया जाएगा और स्कूली शिक्षा में सरकार के अधिक निवेश की मांग की जाएगी।

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