हरियाणा। हरियाणा में व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियों के लिए बिजली निगमों पर निर्भर उपभोक्ताओं को बिजली नियामक आयोग (HERC) से इस बार कोई राहत नहीं मिली है। उद्योगपतियों की ओर से लंबे समय से बिजली बिलों में लगने वाले ‘फिक्स्ड चार्ज’ को तर्कसंगत बनाने और उसे कम करने की वकालत की जा रही थी, जिसे आयोग ने अब खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद प्रदेश की औद्योगिक इकाइयों को पहले की तरह ही भारी-भरकम बिलों का भुगतान जारी रखना होगा, जिससे उद्यमियों में मायूसी है।
उद्योगपतियों का दर्द: कम खपत पर भी देना पड़ रहा है मोटा पैसा
दरअसल, औद्योगिक उपभोक्ताओं ने आयोग के समक्ष आपत्ति दर्ज करवाई थी कि उनसे वसूला जा रहा फिक्स्ड चार्ज न केवल अधिक है, बल्कि अव्यावहारिक भी है। कुछ श्रेणियों में यह चार्ज ₹290 प्रति केवीए (kVA) के हिसाब से वसूला जा रहा है। उद्यमियों का कहना है कि जब मंदी या अन्य कारणों से उत्पादन कम होता है और बिजली की वास्तविक खपत घट जाती है, तब भी यह फिक्स्ड चार्ज बिल के बोझ को बढ़ा देता है। उद्योगों की मांग थी कि इस शुल्क को स्वीकृत लोड (Sanctioned Load) के बजाय वास्तविक मांग (Actual Demand) से जोड़ा जाए ताकि उद्योगों की लागत कम हो और वे बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।
आयोग की दो टूक: घाटे की भरपाई और मेंटेनेंस के लिए चार्ज जरूरी
हालांकि, एचईआरसी ने इन तमाम दलीलों को तकनीकी आधार पर दरकिनार कर दिया है। आयोग का कहना है कि फिक्स्ड चार्ज केवल बिजली बेचने की कीमत नहीं है, बल्कि यह उस पूरे नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर, क्षमता निर्माण और रखरखाव की लागत है जो इंडस्ट्री को 24 घंटे विश्वसनीय बिजली देने के लिए तैयार किया गया है। आयोग के मुताबिक, यह खर्च ‘अनिवार्य प्रकृति’ का है और ऊर्जा की खपत कम हो या ज्यादा, सिस्टम को चालू रखने के लिए यह पैसा जरूरी है। आयोग ने यह भी संकेत दिया कि बिजली वितरण निगमों को वित्त वर्ष 2025-26 में होने वाले ₹3,262 करोड़ के संभावित राजस्व घाटे को पाटने के लिए इस राजस्व की सख्त जरूरत है।
7 साल बाद हुआ बदलाव: टैरिफ स्थिरता का दिया हवाला
आयोग ने अपने फैसले में यह भी याद दिलाया कि हाई टेंशन (HT) उपभोक्ताओं के लिए फिक्स्ड चार्ज में आखिरी बार वित्त वर्ष 2015-16 में बड़ा बदलाव किया गया था। आपूर्ति लागत में लगातार बढ़ोतरी होने के बावजूद लगभग सात सालों तक दरों को नहीं छेड़ा गया था। आयोग का मानना है कि लंबे समय तक टैरिफ स्थिर रहने के कारण अब घाटे को पूरा करने के लिए पुनर्समायोजन (Readjustment) करना विभाग की मजबूरी है। सरल शब्दों में कहें तो, फिलहाल इंडस्ट्री को सस्ती बिजली या कम फिक्स्ड चार्ज की उम्मीद छोड़कर पुराने ढर्रे पर ही चलना होगा।

