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Haryana Mandi News: हरियाणा की मंडियों में 'कच्ची पर्ची' बंद: हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब किसानों को मिलेगी पक्की रसीद

AAmandeep Singh
हरियाणा की मंडियों में 'कच्ची पर्ची' बंद: हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब किसानों को मिलेगी पक्की रसीद
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हरियाणा। हरियाणा की अनाज मंडियों में आढ़तियों और किसानों के बीच ‘कच्ची पर्ची’ का जो धुंधला कारोबार सालों से चल रहा था, वह अब बीते दौर की बात हो गई है। प्रदेश सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए मंडियों में कच्ची पर्ची सिस्टम को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। कृषि एवं विपणन बोर्ड (मार्केटिंग बोर्ड) ने सभी मार्केट कमेटी सचिवों को फरमान जारी कर दिया है कि रबी की फसल बेचने आने वाले किसी भी किसान को अब केवल डिजिटल और प्रिंटेड ‘J-फॉर्म’ ही दिया जाए। यह बदलाव महज एक कागजी औपचारिकता नहीं है, बल्कि उस सिंडिकेट पर चोट है जो सरकारी रिकॉर्ड में एमएसपी दिखाकर धरातल पर किसानों की जेब काट रहा था।

डॉ. लाठर की कानूनी लड़ाई ने बदली व्यवस्था

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इस बड़े बदलाव की नींव भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर की उस जनहित याचिका ने रखी, जिसमें उन्होंने मंडियों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए थे। डॉ. लाठर का तर्क था कि कच्ची पर्ची असल में ‘भ्रष्टाचार का लाइसेंस’ है। उन्होंने साक्ष्यों के साथ अदालत को बताया कि आढ़ती किसानों को हाथ से लिखी पर्चियां देकर कम दाम थमा देते हैं, जबकि सरकारी फाइलों में उसी फसल की खरीद पूरे एमएसपी पर दिखाई जाती है। आंकड़ों का यह बड़ा अंतर सीधे तौर पर किसानों के शोषण और सरकारी खजाने की लूट को उजागर कर रहा था।

हाईकोर्ट की फटकार और सरकार का ‘एक्शन मोड’

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए हरियाणा सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि एक महीने के भीतर इस पर ठोस नीति बनाई जाए। अदालत का रुख भांपते हुए सरकार ने अब स्पष्ट किया है कि हर रसीद पर दुकान का नाम, पता, जीएसटी नंबर और तारीख होना अनिवार्य है। इससे जहां सरकार की साख बहाल होगी, वहीं बिचौलियों के ‘मौज’ वाले दिन खत्म होंगे। सरकार अब एक समर्पित हेल्पलाइन नंबर भी सक्रिय करने जा रही है, जहां किसान पर्ची न मिलने या भुगतान में हेरफेर की शिकायत तुरंत दर्ज करा सकेंगे।

‘J-फॉर्म’ बनेगा किसानों का सुरक्षा कवच

मार्केटिंग बोर्ड के नए निर्देशों के अनुसार, अब ‘J-फॉर्म’ ही लेनदेन का एकमात्र वैध दस्तावेज होगा। इससे किसानों के पास अपनी उपज का पक्का सबूत रहेगा, जिससे उन्हें बैंक लोन, फसल बीमा और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में आसानी होगी। जानकारों का मानना है कि इस सिस्टम के लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और ‘अदृश्य’ कटौती पर लगाम लगेगी। हालांकि, चुनौती अब इस आदेश को जमीन पर लागू करने की है, क्योंकि दशकों पुराना यह ढर्रा बदलना आढ़तियों के लिए किसी झटके से कम नहीं है।

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