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Minimum Wage Haryana: फरीदाबाद की सड़कों पर उतरा मजदूर, दिल्ली की तर्ज पर मांगी 23,195 रुपये मजदूरी

AAmandeep Singh
फरीदाबाद की सड़कों पर उतरा मजदूर, दिल्ली की तर्ज पर मांगी 23,195 रुपये मजदूरी
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फरीदाबाद। हरियाणा के औद्योगिक गलियारों में इन दिनों मशीनों के शोर से ज्यादा मजदूरों की नारेबाजी सुनाई दे रही है। सूबे की सरकार ने जैसे ही न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी का नोटिफिकेशन जारी किया, वैसे ही संतोष के बजाय आक्रोश की लहर दौड़ गई। विशेष रूप से फरीदाबाद और गुरुग्राम के श्रमिक संगठनों ने इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। मजदूरों का कहना है कि जिस राज्य की प्रति व्यक्ति आय देश में अग्रणी होने का दावा किया जाता है, वहां का मजदूर दिल्ली जैसे पड़ोसी राज्यों के मुकाबले कम वेतन पर क्यों गुजारा करे?

दिल्ली और हरियाणा के बीच ‘वेतन की खाई’, महंगाई ने बिगाड़ा बजट

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सीटू (CITU) नेता वीरेंद्र डंगवाल के नेतृत्व में मजदूर संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। डंगवाल का तर्क सीधा है—जब दिल्ली में अकुशल श्रमिक को 18,666 रुपये मिल रहे हैं, तो हरियाणा का मजदूर 15,220 रुपये में कैसे सिमट जाए? मजदूरों का कहना है कि शहर में मकान किराया, बिजली बिल और बच्चों की पढ़ाई के बाद थाली में रोटी तक नहीं बचती। संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि जब तक वेतन 23,195 रुपये नहीं किया जाता, उनका आंदोलन थमेगा नहीं। 8 अप्रैल को गुरुग्राम और फिर फरीदाबाद के सेक्टर-37 में हुआ शक्ति प्रदर्शन इसी गुस्से की एक बानगी है।

इंडस्ट्री की अपनी व्यथा: “खाड़ी युद्ध और मंदी के बीच कहाँ से लाएं पैसा?”

दूसरी ओर, उद्योग जगत इस फैसले को लेकर गहरे संकट में नजर आ रहा है। डीएलएफ इंडस्ट्री एसोसिएशन के प्रधान श्री राम अग्रवाल ने औद्योगिक हकीकत बयां करते हुए कहा कि वे कर्मचारियों को परिवार मानते हैं, लेकिन इंडस्ट्री की वित्तीय सेहत ठीक नहीं है। उन्होंने बताया कि खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध ने सप्लाई चेन बिगाड़ दी है, जिससे कच्चा माल और फ्यूल महंगा हो गया है। जिन कंपनियों में 100 से अधिक कर्मचारी हैं, उन पर हर महीने लाखों रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है। उद्यमियों का डर यह है कि लागत बढ़ने से वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे।

पलायन का खतरा और अनस्किल्ड वर्कर्स की चुनौती

वेतन विवाद का एक पहलू मजदूरों का पलायन भी है। बेहतर सुविधाओं की तलाश में हुनरमंद श्रमिक दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं। उद्यमियों का कहना है कि वे अनस्किल्ड वर्कर्स को काम सिखाते हैं, ट्रेनिंग देते हैं, लेकिन अब शुरुआती स्तर पर ही ऊंचे वेतन की बाध्यता नई नियुक्तियों के लिए बाधा बन रही है। दूसरी ओर, यूनियन नेताओं का आरोप है कि सरकार ने 2 मार्च को विधानसभा में प्रस्ताव पास करने के बावजूद इसे लागू करने में देरी की और जब किया तो वह भी पर्याप्त नहीं था।

फिलहाल, हरियाणा का औद्योगिक पहिया विवादों के बीच घूम रहा है। एक तरफ पेट की आग है और दूसरी तरफ मंदी की मार। अब देखना यह है कि क्या सरकार बीच का कोई रास्ता निकाल पाएगी या यह आंदोलन किसी बड़ी औद्योगिक हड़ताल की शक्ल लेगा।

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