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Haryana Municipal Corporation Election : हरियाणा नगर निगम चुनाव: कांग्रेस का बड़ा धमाका, अब 'हाथ' के सिंबल पर ठोकेंगे ताल, बीजेपी को सीधी चुनौती

AAmandeep Singh
हरियाणा नगर निगम चुनाव: कांग्रेस का बड़ा धमाका, अब 'हाथ' के सिंबल पर ठोकेंगे ताल, बीजेपी को सीधी चुनौती
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हरियाणा। हरियाणा कांग्रेस में अक्सर यह देखा गया है कि गुटबाजी के डर से पार्टी स्थानीय निकाय चुनावों में सिंबल देने से कतराती रही है। दिग्गज नेताओं को डर रहता था कि टिकट न मिलने पर बागी सुर पार्टी की साख बिगाड़ सकते हैं। लेकिन, 2025 के अनुभवों और प्रदेश की बदलती राजनीतिक हवा को भांपते हुए हुड्डा कैंप और आलाकमान ने अब सीधे मुकाबले का मन बना लिया है।

इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ के पीछे के 3 बड़े कारण:

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संगठन की धार तेज करना: सिंबल पर चुनाव लड़ने का मतलब है कि हर वार्ड में पार्टी का झंडा और डंडा नजर आएगा। इससे सुस्त पड़े संगठन में जान फूंकने और बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में मदद मिलेगी।

शहरी जनाधार की परीक्षा: भाजपा पारंपरिक रूप से शहरी इलाकों में मजबूत मानी जाती रही है। कांग्रेस अब अपने सिंबल पर लड़कर यह परखना चाहती है कि शहरों में उसकी खोई हुई जमीन वापस लौटी है या नहीं। यह चुनाव आगामी विधानसभा चुनाव के लिए ‘सेमीफाइनल’ की तरह देखा जा रहा है।

भाजपा के नैरेटिव को तोड़ना: भाजपा अक्सर कांग्रेस पर चुनावी मैदान से भागने या ‘इंडिपेंडेंट’ के पीछे छिपने का आरोप लगाती रही है। अब सिंबल पर उतरकर कांग्रेस ने यह संदेश दिया है कि वह सीधे और आमने-सामने के मुकाबले के लिए तैयार है।

चुनौती: गुटबाजी और टिकट वितरण का सिरदर्द

राजनीतिक पंडितों की मानें तो यह फैसला कांग्रेस के लिए ‘दोधारी तलवार’ भी साबित हो सकता है। हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी जगजाहिर है। जब सिंबल पर चुनाव होगा, तो टिकट के दावेदारों की लंबी कतार लगेगी। ऐसे में एक धड़े के चहेते को टिकट मिलने पर दूसरे धड़े की नाराजगी झेलना प्रदेश अध्यक्ष के लिए बड़ी चुनौती होगी। हालांकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस बार टिकट का आधार केवल ‘विनेबिलिटी’ (जीतने की क्षमता) और सर्वे रिपोर्ट को बनाया जाएगा।

मैदान में अब मुकाबला होगा दिलचस्प

भाजपा पहले ही अपने सिंबल ‘कमल’ पर लड़ने का ऐलान कर चुकी है। अब कांग्रेस के इस फैसले के बाद मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय न होकर मुख्य रूप से दो ध्रुवों के बीच सिमटता नजर आ रहा है। क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों के लिए अब इन दो बड़े दिग्गजों के बीच अपनी जगह बनाना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल होगा।

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