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Haryana Municipal Elections : हरियाणा नगर निगम चुनाव पर हाईकोर्ट की तलवार: फैमिली आईडी से आरक्षण तय करने पर उठे सवाल

AAmandeep Singh
हरियाणा नगर निगम चुनाव पर हाईकोर्ट की तलवार: फैमिली आईडी से आरक्षण तय करने पर उठे सवाल
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हरियाणा। हरियाणा के नगर निगम चुनावों की रणभेरी बजने से पहले ही मामला कोर्ट की चौखट पर पहुँच गया है। प्रदेश सरकार द्वारा सीटों के निर्धारण और आरक्षण के लिए 2011 की जनगणना के बजाय फैमिली इंफॉर्मेशन डेटा रिपॉजिटरी (FIDR) यानी परिवार पहचान पत्र के डेटा का इस्तेमाल करने पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है। पूर्व पार्षद उषा रानी सहित कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने सरकार के इस कदम को असंवैधानिक करार दिया है। याचिका में साफ कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद 243-पी स्पष्ट करता है कि चुनावी प्रक्रिया में ‘जनसंख्या’ का तात्पर्य केवल आधिकारिक तौर पर प्रकाशित अंतिम जनगणना के आंकड़ों से है। सरकार द्वारा किया गया बदलाव लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए बड़ा खतरा बताया जा रहा है।

पंचकूला के वार्ड परिसीमन पर गंभीर सवाल

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विवाद केवल डेटा तक सीमित नहीं है, बल्कि वार्डों की काट-छांट यानी परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी स्थानीय स्तर पर भारी गुस्सा है। याचिका में पंचकूला नगर निगम का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया गया है कि प्रशासन ने वार्डों की सीमाओं का निर्धारण करते समय न तो भौगोलिक एकरूपता का ध्यान रखा और न ही जनसंख्या के अनुपात का। आरोप है कि जनता की ओर से दर्ज कराई गई आपत्तियों को दरकिनार करते हुए जल्दबाजी में अंतिम अधिसूचना जारी कर दी गई। नियमों के मुताबिक, आपत्तियों का निपटारा किए बिना परिसीमन फाइनल नहीं किया जा सकता, जिसे याचिकाकर्ताओं ने हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 का सीधा उल्लंघन बताया है।

आरक्षण की प्रक्रिया पर भी उठा विवाद

याचिकाकर्ताओं ने 10 अप्रैल 2026 को जारी उस अधिसूचना को भी कटघरे में खड़ा किया है, जिसमें केवल अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीटों का ऐलान किया गया था। सवाल उठाया गया है कि जब चुनाव पूरी निगम के होने हैं, तो पिछड़ा वर्ग (BC-A और BC-B) और सामान्य वर्ग की सीटों का निर्धारण एक साथ क्यों नहीं किया गया? इसे ‘पिक एंड चूज’ की नीति बताते हुए मनमाना और भेदभावपूर्ण करार दिया गया है। साथ ही, मेयर पद के लिए होने वाले ‘ड्रॉ ऑफ लॉट्स’ (चिट्ठी प्रक्रिया) को भी पूरे राज्य में एक समान रूप से लागू न करने पर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए गए हैं।

क्या अब टल जाएंगे चुनाव?

वर्तमान स्थिति यह है कि राज्य सरकार ने बिना नई जनगणना के एफआईडीआर डेटा के आधार पर सीटों का पूरा स्वरूप बदल दिया है। इससे पहले 2011 की जनगणना को आधार माना गया था, लेकिन अब नए आंकड़ों के उपयोग से आरक्षित सीटों की संख्या और स्थिति बदल गई है। याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट से पुरजोर मांग की है कि जब तक इस कानूनी विवाद का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक चुनावी प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाई जाए। अब सबकी नजरें हाई कोर्ट की अवकाशकालीन बेंच पर टिकी हैं, जिसकी सुनवाई यह तय करेगी कि हरियाणा में नगर निगम चुनाव समय पर होंगे या डेटा के इस फेरबदल में उलझकर रह जाएंगे।

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