हरियाणा। हरियाणा की पंचायतों में पंच और सरपंच बनने की हसरत रखने वाले नेताओं के लिए राज्य चुनाव आयोग ने तगड़ी घेराबंदी कर दी है। अब चुनाव लड़ने से पहले उम्मीदवारों को अपने चरित्र का प्रमाण पत्र खुद जनता की अदालत में पेश करना होगा। नए निर्देशों के तहत, यदि किसी प्रत्याशी के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला दर्ज है, लंबित है या उसे किसी मामले में सजा हो चुकी है, तो उसे इसका पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करना ही होगा। चुनाव आयोग का यह कदम ग्रामीण राजनीति में पारदर्शिता लाने और साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को आगे बढ़ाने की कवायद माना जा रहा है।
दो अखबारों में विज्ञापन और तीन बार घोषणा अनिवार्य
सरकारी प्रवक्ता द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस बार नियम बेहद सख्त हैं। किसी भी दागी उम्मीदवार को अपनी आपराधिक कुंडली क्षेत्र के कम से कम दो बड़े अखबारों (एक हिंदी और एक अंग्रेजी) में प्रकाशित करवानी होगी। यह सिर्फ औपचारिकता भर नहीं है, बल्कि आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह घोषणा ‘प्रारूप 1-K’ में कम से कम तीन अलग-अलग मौकों पर छपवानी होगी। इस प्रक्रिया के लिए समय भी तय कर दिया गया है—नामांकन वापसी की आखिरी तारीख के अगले दिन से लेकर मतदान शुरू होने के ठीक दो दिन पहले तक यह विज्ञापन छप जाना चाहिए।
राजनीतिक दलों पर भी कसेगा शिकंजा
सिर्फ निर्दलीय ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर भी यह नियम सख्ती से लागू होगा। चाहे दल मान्यता प्राप्त हो या गैर-मान्यता प्राप्त, उसे अपने उम्मीदवार के आपराधिक इतिहास की जानकारी जिला निर्वाचन अधिकारी यानी डीसी को रिपोर्ट के रूप में देनी होगी। उम्मीदवारों को यह लिखकर देना होगा कि उन्होंने अपनी पार्टी को अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों के बारे में पहले ही सूचित कर दिया है। इससे अब पार्टियां भी ‘दागी’ चेहरों को टिकट देने से पहले दो बार सोचने पर मजबूर होंगी।
क्यों पड़ी इस नए सिस्टम की जरूरत?
दरअसल, नगर निगम चुनावों में यह सिस्टम पहले से ही लागू था, लेकिन अब इसे पंचायत स्तर तक ले जाया गया है। राज्य चुनाव आयोग का लक्ष्य है कि वोटर को अपने उम्मीदवार के बारे में सब कुछ पता हो—चाहे वो उसकी संपत्ति हो या उसका आपराधिक इतिहास। हरियाणा के ग्रामीण अंचलों में अक्सर रसूख और बाहुबल के दम पर चुनाव प्रभावित करने की कोशिशें होती रही हैं, जिन पर यह नया नियम काफी हद तक लगाम लगा सकता है। अब देखना यह होगा कि 2026 के इन चुनावों में इस पारदर्शिता का असर जमीनी स्तर पर कितना पड़ता है।

