Hisar Ramlila Tradition: भारतीय सनातन संस्कृति में रामलीला केवल भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र का मंचन मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारी धार्मिक परंपरा, आपसी भाईचारे और सामाजिक एकजुटता का सबसे जीवंत प्रतीक है।
बदलते वक्त के साथ मनोरंजन के साधन भले ही डिजिटल हो गए हों, लेकिन हरियाणा के हिसार शहर में दशकों से चली आ रही रामलीला की अनूठी परंपरा आज भी लोगों के दिलों में उतनी ही गहराई से रची-बसी है। (Multani Chowk Ramlila Hisar) वक्त के इस सफर में मंच की सजावट, आधुनिक रोशनी और तकनीक का स्वरूप भले ही पूरी तरह बदल गया हो, लेकिन प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा और रामायण के आदर्शों को आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने का पवित्र उद्देश्य आज भी जस का तस कायम है।
78 साल पुराना मुल्तानी चौक का सफर और विभाजन की यादें
हिसार की रामलीलाओं के इतिहास पर नजर डालें तो श्री नृसिंह प्रह्लाद रामलीला सभा, मुल्तानी चौक का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। सभा के पदाधिकारियों के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें करीब 200 साल पुरानी और पाकिस्तान के मुल्तान शहर से जुड़ी हैं। (Gambling Act Haryana Police) देश के दर्दनाक विभाजन के दौरान डॉ. जयदयाल ठकराल और श्याम लाल चावला इस महान सांस्कृतिक विरासत को मुल्तान से हिसार लेकर आए थे। वर्ष 1948 में मुल्तानी चौक पर इसका विधिवत मंचन शुरू हुआ।
शुरुआती दौर में संसाधन बहुत सीमित थे; रात आठ बजे से सुबह छह बजे तक चलने वाले इस आयोजन में लकड़ी की कुछ बेंचों को जोड़कर मंच बनाया जाता था और उजाले के लिए लालटेन का इस्तेमाल होता था। उस दौर में 3 से 5 हजार दर्शक पूरी रात बैठकर कथा सुनते थे, जो अब बढ़कर करीब 10 हजार तक पहुंच चुके हैं।
कटला रामलीला की 129 साल पुरानी विरासत और स्वतंत्रता संग्राम के गवाह
शहर की दूसरी सबसे प्राचीन संस्था—श्री रामलीला कमेटी कटला—लगभग 129 साल पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। इस ऐतिहासिक मैदान का नाता केवल धार्मिक आयोजनों से नहीं रहा, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों का भी गवाह है। आजादी से पहले यहां बड़ी-बड़ी राजनीतिक जनसभाएं होती थीं और साल 1947 में स्वतंत्रता मिलने पर इसी प्रांगण में भारी संख्या में लोगों ने एकत्र होकर तिरंगा फहराया था।
वर्तमान में इस कमेटी की विशेषता यह है कि यहां वृंदावन के प्रसिद्ध कलाकारों को बुलाया जाता है। (History of Hisar Ramlila) कृष्ण लीला संस्थान, वृंदावन से जुड़े लगभग 35 कलाकारों की टीम पारंपरिक वेशभूषा और शास्त्रीय शैली में राम, सीता, लक्ष्मण और रावण के किरदारों को जीवंत करती है। आज भी यहां पुरुष कलाकार ही महिला पात्रों की भूमिकाएं पूरी गरिमा के साथ निभाते हैं।
तकनीक बदली, बजट बढ़ा, पर मूल भावना आज भी बरकरार
समय के पहिए के साथ आयोजन का खर्च और तौर-तरीके भी काफी बदल चुके हैं। श्री नृसिंह प्रह्लाद रामलीला सभा के पदाधिकारी भीम सिंह नारंग बताते हैं कि कभी जिस आयोजन पर महज 50 हजार रुपये खर्च होते थे, वह अब बढ़कर लगभग 10 लाख रुपये तक पहुंच गया है। आधुनिक एलईडी पर्दे, बेहतरीन साउंड सिस्टम और भव्य सेट ने दृश्यों को और भी प्रभावी बना दिया है।
इसके बावजूद, आयोजकों और शहरवासियों की आस्था में कोई कमी नहीं आई है। कटला रामलीला कमेटी के प्रधान विनोद गुप्ता का मानना है कि इस तरह के आयोजन आज के दौर में बच्चों और युवाओं को हमारे संस्कारों, संस्कृति और जीवन के वास्तविक मूल्यों से जोड़ने का सबसे बड़ा माध्यम हैं। हाल ही में निकाली गई भव्य श्री राम बारात और झांकियों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हिसार की यह सांस्कृतिक धारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरंतर बहती आ रही है।
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