Jhajjar News: अक्सर छोटी-छोटी बातों पर बच्चों के मन में बैठा डर उन्हें कितना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर देता है, इसकी एक बानगी झज्जर जिले के बहादुरगढ़ में देखने को मिली। सेक्टर-2 के रहने वाले अमित कुमार का नौवीं कक्षा में पढ़ने वाला बेटा स्कूल टेस्ट में खराब प्रदर्शन और कम नंबर आने की आशंका से बुरी तरह सहम गया था।
उसे यह डर सता रहा था कि घर लौटने पर माता-पिता उसे डांटेंगे। इसी मानसिक तनाव के चलते उसने घर छोड़ने का खौफनाक फैसला ले लिया। छात्र चुपचाप अपनी साइकिल लेकर घर से निकला और सीधे रेलवे स्टेशन जा पहुंचा, जहां से वह ट्रेन में बैठकर सीधे उत्तर प्रदेश के वृंदावन पहुंच गया।
मंदिर के बंद कपाट और रात के अंधेरे में रोता रहा बच्चा
अजब-गजब हालात में वृंदावन पहुंचे छात्र के पास न तो ठहरने का कोई ठिकाना था और न ही आगे की कोई योजना। जब वह मंदिरों के चक्कर काट रहा था, तब तक रात हो चुकी थी और मंदिर के कपाट भी बंद हो चुके थे।
अनजान शहर और अंधेरे के बीच अकेला पाकर बच्चा बुरी तरह घबरा गया और सड़क पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। गनीमत यह रही कि रात के वक्त वहां से गुजर रहे एक सजग नागरिक की नजर उस लावारिस बच्चे पर पड़ गई। उस भले इंसान ने बच्चे के पास जाकर उसकी सुध ली और ढांढस बंधाया।
आईकार्ड बना जीवन रक्षक, पिता ने रातों-रात तय किया सफर
रोते हुए बच्चे से जब पूछताछ की गई तो उसके गले में स्कूल का आईकार्ड लटका नजर आया। उस व्यक्ति ने तुरंत आईकार्ड पर लिखे संपर्क नंबर पर फोन मिलाया, जो सीधे उसके पिता अमित कुमार का था।
जैसे ही पिता के फोन की घंटी बजी और उन्हें पता चला कि उनका बेटा सैकड़ों किलोमीटर दूर वृंदावन में सुरक्षित है, परिवार के पैरों तले से जमीन खिसकते-खिसकते बची। बिना एक पल गंवाए अमित कुमार रात करीब दस बजे अपनी गाड़ी लेकर वृंदावन के लिए रवाना हो गए। अहले सुबह करीब चार बजे पिता अपने जिगर के टुकड़े को सकुशल लेकर वापस बहादुरगढ़ लौट आए।
पुलिस प्रशासन की अपील: बच्चों पर न बनाएं मानसिक दबाव
इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद स्थानीय थाना प्रभारी (एसएचओ) सत्यवीर सिंह ने अभिभावकों के लिए एक बेहद जरूरी संदेश दिया है। एसएचओ ने अपील करते हुए कहा कि बच्चों की जिंदगी और उनकी मानसिक सेहत पढ़ाई के नंबरों से कहीं ज्यादा कीमती है। टेस्ट या परीक्षा में कम अंक आने पर बच्चों को सजा देने या डांटने के बजाय उन्हें प्यार से समझाना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों पर नंबरों का अनावश्यक दबाव न डालें, बल्कि उनका हौसला बढ़ाएं ताकि भविष्य में कोई भी बच्चा डरकर ऐसा खतरनाक कदम उठाने की हिम्मत न करे।
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