Jind News: जींद अदालत में गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और उसके भाई अनमोल के अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस ने चौंकाने वाली परतें खोली हैं। अदालत में पेश किए गए तथ्यों के मुताबिक, यह पूरा नेटवर्क ‘रेमिटली’ (Remitly), क्रिप्टो (USDT) और हवाला चैनलों के माध्यम से भारत में पैसों की हेराफेरी कर रहा है। इसी मामले में पानीपत के आसन कलां गांव के रहने वाले 25 वर्षीय दिनेश की जमानत याचिका पर वीरवार को एडीजे जयबीर सिंह की अदालत में फैसला आया, जहां जज ने आरोपी के पक्ष को खारिज करते हुए उसकी जमानत अर्जी नामंजूर कर दी। दिनेश पिछले साल 24 जून से जेल में बंद है।
हवाला और क्रिप्टो से हो रही थी फंडिंग
जींद पुलिस के सब-इस्पेक्टर हरी प्रकाश ने अदालत को बताया कि साबरमती जेल में बंद लॉरेंस और अमेरिका में बैठे अनमोल बिश्नोई का यह गिरोह देश में संगठित अपराधों को बढ़ावा दे रहा है। अमेरिका में बैठे ट्रांसपोर्टर रणदीप मलिक और पानीपत के अनिल पंडित के जरिए भारत में 30 से अधिक लोगों को पैसे भेजे गए। इन पैसों का इस्तेमाल रंगदारी वसूलने, होटलों में ठहरने, हथियारों की ढुलाई और गत 26 नवंबर 2024 को चंडीगढ़ में हुए बम धमाकों जैसी वारदातों में किया गया। पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी दिनेश एनक्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप ‘सिग्नल’ के जरिए सीधे गैंगस्टर अनिल पंडित के संपर्क में था और उसके खाते में 20,000 रुपये ट्रांसफर किए गए थे।
बचाव पक्ष की दलील और सरकारी वकील का कड़ा विरोध
सुनवाई के दौरान आरोपी दिनेश के वकील वीएस भांखड़ ने दलील दी कि उनका मुवक्किल एक साधारण प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड है, जिसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वकील ने तर्क दिया कि दिनेश के पिता पिछले कई सालों से पैरालिसिस से पीड़ित हैं और घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उसने सह-आरोपी अनिल से केवल मदद के रूप में पैसे मांगे थे, जो कुलदीप के खाते से आए थे।
दूसरी ओर, सरकारी वकील सुरेंद्र खटकड़ ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह विदेशी गैंगस्टरों के सीधे संपर्क में रहकर संगठित अपराध का हिस्सा बना हुआ है। यदि ऐसे आरोपी को बाहर छोड़ा गया, तो उसके फरार होने और दोबारा आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने की पूरी आशंका है।
कोर्ट ने कहा- आर्थिक मदद का तर्क स्वीकार्य नहीं
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जयबीर सिंह ने दोनों पक्षों की लंबी बहस सुनने के बाद अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी का यह दावा कि उसने केवल इलाज के लिए पैसे लिए थे, स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह राशि किसी लोन या वैध लेनदेन के तहत नहीं आई थी। इसके अलावा, सिग्नल ऐप पर निरंतर संपर्क इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि वह इस सिंडिकेट का सक्रिय हिस्सा रहा है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस मामले में अन्य सह-आरोपियों की भूमिका अलग थी, इसलिए दिनेश को राहत नहीं दी जा सकती। गंभीर आरोपों और सबूतों को देखते हुए अदालत ने उसकी नियमित जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
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