Mahendragarh : हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में सरस्वती-सिंधु सभ्यता पर एकदिवसीय गोष्ठी आयोजित, राखीगढ़ी की खुदाई और नए साक्ष्यों पर हुई व्यापक चर्चा
सम्मेलन में अतिथियों को सम्मानित करते समकुलपति प्रो. पवन कुमार शर्मा ।
Mahendragarh : हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र द्वारा सरस्वती-सिंधु सभ्यता पर एकदिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में हरियाणा सरकार के पुरातत्व विभाग के सह निदेशक डॉ. नरेंद्र परमार, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहासकार एवं प्रोफेसर केशव मिश्रा तथा प्रसिद्ध पुरातत्वविद प्रोफेसर जीवन खड़कवाल ने विशेषज्ञ वक्ता के रूप में सहभागिता की।
कार्यक्रम में सरस्वती-सिंधु सभ्यता के विभिन्न पहलुओं, हाल के पुरातात्विक शोधों, राखीगढ़ी सहित विभिन्न स्थलों पर हुई खुदाई से प्राप्त साक्ष्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा के समकालीन महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने भारतीय सभ्यता के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक पक्षों को सामने रखते हुए भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता पर बल दिया।

हरियाणा सरकार के पुरातत्व विभाग के सह निदेशक डॉ. नरेंद्र परमार ने छायाचित्रों एवं पीपीटी प्रस्तुति के माध्यम से राखीगढ़ी तथा अन्य पुरातात्विक स्थलों पर हाल के समय में की गई खुदाई से प्राप्त उत्साहजनक परिणामों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन स्थलों से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य प्राचीन भारतीय सभ्यता की समृद्धि, उसकी ऐतिहासिक निरंतरता और सांस्कृतिक विशेषताओं को समझने के नए अवसर प्रदान कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि खुदाई से प्राप्त नए साक्ष्यों के आधार पर प्राचीन भारतीय इतिहास को लेकर प्रचलित धारणाओं पर नए सिरे से विचार किया जा रहा है और एक पूरी विचारधारा करवट ले रही है। उन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता को दुनिया की सबसे समृद्ध सभ्यताओं में से एक बताते हुए इसके व्यापक अध्ययन और शोध की आवश्यकता पर जोर दिया।

प्रसिद्ध पुरातत्वविद प्रोफेसर जीवन खड़कवाल ने भी छायाचित्रों के माध्यम से अपने हालिया शोध कार्यों और पुरातात्विक अन्वेषणों के निष्कर्षों को प्रस्तुत किया।
उन्होंने पुरातात्विक साक्ष्यों के अध्ययन के माध्यम से प्राचीन सभ्यताओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्वरूप को समझने के महत्व पर प्रकाश डाला। उनकी प्रस्तुति में हाल में किए गए शोध और उनसे प्राप्त जानकारियों को प्रमुखता से सामने रखा गया।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर केशव मिश्रा ने भारतीय ज्ञान परंपरा के समसामयिक महत्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान समय में प्रासंगिक बताते हुए इसके अध्ययन, संरक्षण और व्यापक प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों को समझना भारतीय समाज, संस्कृति और बौद्धिक विरासत को जानने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर टंकेश्वर कुमार ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र द्वारा संचालित विभिन्न गतिविधियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शोधपरक पद्धति से किया जाना चाहिए।
उन्होंने भगवान श्रीराम के जन्म और जीवनकाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वैज्ञानिक पद्धति के माध्यम से इन विषयों के विभिन्न पक्षों को समझने और उनके अध्ययन की संभावनाओं पर कार्य किया जा सकता है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और उसके अकादमिक अध्ययन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
विश्वविद्यालय के समकुलपति प्रोफेसर पवन कुमार शर्मा ने अपने संबोधन में विश्व स्तर पर भारत के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता को लेकर प्रचलित विमर्श तथा भारत के विरुद्ध चल रहे नॉरेटिव पर चर्चा की।
उन्होंने भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए भारतीय दृष्टिकोण से अध्ययन और शोध की आवश्यकता को रेखांकित किया।
भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र के निदेशक प्रोफेसर आनंद शर्मा ने कार्यक्रम के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस गोष्ठी का मूल उद्देश्य भारत को भारतीय दृष्टि से समझने का एक प्रयास है।
उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास, संस्कृति, सभ्यता और ज्ञान परंपरा के अध्ययन के माध्यम से अपनी विरासत को व्यापक संदर्भ में समझा जा सकता है। उन्होंने विशेषज्ञों की सहभागिता को इस दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम में प्रोफेसर पायल चंदेल ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया तथा आमंत्रित अतिथियों का परिचय कराया। उन्होंने गोष्ठी के विषय की प्रासंगिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन के महत्व को रेखांकित किया। मंच संचालन डॉ. संजीत कुमार ने किया।
इस अवसर पर भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र के सदस्य प्रोफेसर नंदकिशोर, डॉ. नीरज कर्ण सिंह, विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
