Narnaul News: प्रदेश में 1 अक्टूबर से बाजरे की सरकारी खरीद आधिकारिक रूप से शुरू हो चुकी है, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है। खरीद प्रक्रिया शुरू हुए एक हफ्ता बीत जाने के बावजूद सरकारी एजेंसियां किसानों का बाजरा खरीदने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं।
एक तरफ जहां सरकारी खरीद के नाम पर महज खानापूर्ति हो रही है, वहीं दूसरी ओर मजबूरन किसानों को अपनी फसल प्राइवेट आढ़तियों के पास कम भाव पर बेचने के लिए विवश होना पड़ रहा है।

गेट पास और आवक के आंकड़े बयां कर रहे बदहाली
मंडी के आंकड़ों के अनुसार, 1 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक कुल 1,296 गेट पास जारी किए गए हैं, जिनमें से अकेले 8 अक्टूबर को 485 गेट पास काटे गए। नारनौल मंडी में अब तक बाजरे की कुल आवक 33,586 क्विंटल पहुंच चुकी है, जिसमें से केवल एक दिन में ही 12,600 क्विंटल बाजरे की बंपर आवक दर्ज की गई।
सरकारी खरीद नगण्य, प्राइवेट आढ़तियों की चांदी
भारी आवक के बावजूद सरकारी एजेंसियों की सुस्त कार्यप्रणाली के चलते अब तक केवल 165 क्विंटल बाजरे की ही सरकारी खरीद हो पाई है। इसके विपरीत, प्राइवेट आढ़तियों ने अब तक 27,000 क्विंटल बाजरा खरीद लिया है। प्राइवेट आढ़ती किसानों से 2,225 रुपये से लेकर 2,371 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बाजरा खरीद रहे हैं। सरकारी खरीद केंद्रों पर व्यवस्थाएं दुरुस्त न होने के कारण किसानों को अपनी मेहनत की कमाई प्राइवेट व्यापारियों को सौंपनी पड़ रही है।
इलेक्ट्रॉनिक झरने का उपयोग और किसानों का दर्द
इस बार सरकारी खरीद में इलेक्ट्रॉनिक झरने का उपयोग किया जा रहा है। किसान सुरेश, सुनील और ओमप्रकाश बताते हैं कि वे अपना बाजरा मंडी में इसलिए लेकर आए थे ताकि सरकार के तय किए गए भाव पर उनकी फसल बिक सके, लेकिन यहां उन्हें कहा गया कि फसल को पहले इलेक्ट्रॉनिक झरने से साफ करवाना होगा।
किसानों का कहना है कि इससे उन्हें दोहरा नुकसान हो रहा है—एक तो झरने की मजदूरी 40 रुपये प्रति क्विंटल ली जा रही है, दूसरा हवा के साथ बाजरे का छोटा दाना भी उड़ जाता है जिससे भारी नुकसान होता है। यही वजह है कि मजबूरी में उन्हें प्राइवेट आढ़तियों को सरकारी भाव से कम रेट पर फसल बेचनी पड़ रही है।

प्रधान बोले, किसानों का नुकसान नहीं होने देंगे
मामले पर मार्केट कमेटी के प्रधान बाबुलाल यादव ने कहा कि वे किसानों का किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं होने देंगे। एजेंसियों की लापरवाही के चलते सरकारी खरीद में विलंब हुआ है और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई जरूर होगी। इस संबंध में उपायुक्त ने हैफेड के प्रबंध निदेशक, पंचकूला को पत्र भेजकर जिला प्रबंधक पर लापरवाही, ड्यूटी में कोताही और मंडियों में समय पर खरीद शुरू न करने पर कार्रवाई करने का आग्रह किया है।

बहरहाल, सरकारी खरीद के आंकड़े यह साफ बयां कर रहे हैं कि कहीं न कहीं कोई बड़ी गड़बड़ जरूर है। सरकारी और प्राइवेट खरीद के आंकड़ों में दिन-रात का यह अंतर क्या किसी बड़ी मिलिभगत की ओर इशारा कर रहा है?
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