Navratri Kanya Pujan: शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में बेहद खास स्थान रखता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधिवत पूजा की जाती है और साथ ही कन्या पूजन की प्राचीन परंपरा को निभाया जाता है। इस अनुष्ठान में छोटी बच्चियों को मां दुर्गा का जीवंत स्वरूप मानकर उनके चरण धोए जाते हैं, उन्हें माथे पर कुमकुम का तिलक लगाया जाता है और आदर के साथ हलवा, पूरी तथा काले चने का प्रसाद खिलाया जाता है। इसके अलावा, एक बेहद अहम परंपरा के तहत कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन कराया जाता है, जिसे क्षेत्र विशेष में बटुक, बटुक भैरव या लंगूर के नाम से पुकारा जाता है। साल 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर, रविवार से आरंभ होकर 20 अक्टूबर, मंगलवार को विजयादशमी के पावन पर्व के साथ संपन्न होगी। इस दौरान अष्टमी और नवमी के मौके पर लाखों घरों और मंदिरों में कन्या पूजन होगा, ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि शास्त्रों के अनुसार इसके क्या नियम हैं।
कन्या पूजन के लिए क्या है सही उम्र?
धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के मुताबिक, कन्या पूजन के लिए 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की आयु की बच्चियों को चुनना सबसे उत्तम फलदायी माना गया है। इस उम्र की कन्याओं को निष्कलंक और देवी ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। अलग-अलग आयु वर्ग की कन्याओं के पूजन का अपना अलग धार्मिक महत्व और फल बताया गया है, जो साधक की मनोकामनाओं को पूरा करता है। दो वर्ष की आयु की कन्या के पूजन से घर में सुख-समृद्धि आती है, जबकि इस तय आयु सीमा के भीतर की अन्य बच्चियों को भी मां के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करते हुए पूजा जाता है।
क्यों बैठाया जाता है बटुक भैरव और क्या है उम्र का नियम?
नवरात्रि के अनुष्ठान में केवल कन्याओं को ही नहीं, बल्कि उनके साथ एक बालक को भी अनिवार्य रूप से भोजन कराने की परंपरा है। इस बालक को बटुक, बटुक भैरव या कई जगहों पर ‘लंगूर’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बटुक भैरव भगवान शिव का ही बाल स्वरूप हैं और देवी दुर्गा की उपासना में उनका विशेष स्थान व महत्व है। यही कारण है कि मां की पूजा को पूर्ण और फलदायी बनाने के लिए नौ कन्याओं के साथ एक बटुक को भी आमंत्रित किया जाता है। उसे भी ठीक उसी तरह आदरपूर्वक ऊंचे आसन पर बैठाया जाता है और प्रसाद ग्रहण कराया जाता है।
बटुक या लांगुरिया की आयु को लेकर भी धार्मिक नियम स्पष्ट किए गए हैं। मान्यताओं के अनुसार, बटुक के रूप में आमंत्रित किए जाने वाले बालक की उम्र 5 से 8 वर्ष के बीच होनी चाहिए। इस आयु वर्ग के बालक को भगवान भैरव का प्रतीक मानकर भोजन कराना अनुष्ठान का एक अनिवार्य और पवित्र हिस्सा माना गया है, जिसके बिना नवरात्रि की पूजा अधूरी मानी जाती है।
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