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New Labour Codes Protest: 1 अप्रैल को देशभर में 'काला दिवस': नए श्रम कानूनों के खिलाफ मजदूरों का बड़ा ऐलान

AAmandeep Singh
1 अप्रैल को देशभर में 'काला दिवस': नए श्रम कानूनों के खिलाफ मजदूरों का बड़ा ऐलान
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हरियाणा। भारत के श्रम सुधारों के नाम पर केंद्र सरकार द्वारा लागू किए जा रहे नए चार लेबर कोड्स अब आर-पार की जंग का सबब बन गए हैं। आगामी 1 अप्रैल को देशभर के औद्योगिक क्षेत्रों, सरकारी दफ्तरों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले लाखों मजदूर-कर्मचारी ‘काला दिवस’ मनाएंगे। इस विरोध प्रदर्शन की कमान संभाल रहे सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के हरियाणा राज्य महासचिव जय भगवान ने स्पष्ट किया कि यह केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि श्रमिकों के भविष्य को बचाने की एक बड़ी मुहिम है। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि इन कानूनों को बिना किसी सार्थक चर्चा के थोपा जा रहा है।

“ब्रिटिश काल जैसी शोषणकारी व्यवस्था”: जय भगवान का कड़ा प्रहार

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सीटू के महासचिव जय भगवान ने चंडीगढ़ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि नए श्रम कानून देश के असली संपत्ति सृजनकर्ताओं यानी मजदूरों को वापस ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास हैं। उन्होंने बताया कि नए लेबर कोड्स में ऐसे दमनकारी प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनसे अब ट्रेड यूनियन बनाना और उनका पंजीकरण बरकरार रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जहां नियोक्ताओं (Employers) द्वारा किए जाने वाले उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है, वहीं ट्रेड यूनियन की जायज गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है।

हड़ताल का अधिकार खत्म और काम के घंटों पर अनिश्चितता

कर्मचारी संगठनों का सबसे बड़ा विरोध ‘काम के घंटों’ और ‘हड़ताल’ को लेकर है। नए कानूनों के तहत कार्य समय की सीमा को लचीला छोड़ दिया गया है, जिससे डर है कि कंपनियां मनमाने ढंग से काम के घंटे बढ़ा देंगी। साथ ही, हड़ताल करने के अधिकार को लगभग समाप्त ही कर दिया गया है, जिससे मजदूर अपनी मांगों के लिए दबाव बनाने की स्थिति में नहीं रहेंगे। ‘फिक्स्ड टर्म रोजगार’ को सामान्य बनाने की कोशिश से अब स्थायी नौकरियों का कॉन्सेप्ट भी खत्म होने के कगार पर है, जिससे युवाओं के सामने भविष्य का संकट खड़ा हो गया है।

सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम वेतन पर ‘दिखावे’ का आरोप

सरकार भले ही सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा (Universal Social Security) का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आती है। श्रमिक नेताओं का कहना है कि मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया गया है और बड़ी संख्या में मजदूरों को इस दायरे से बाहर रखा जा रहा है। यही नहीं, न्यूनतम वेतन कानूनों को लचीला बनाकर एक ऐसा ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ थोपने की कोशिश हो रही है, जो गरीबी रेखा से भी नीचे है। 1 अप्रैल को होने वाला यह ‘काला दिवस’ न केवल इन कानूनों की खामियों को उजागर करेगा, बल्कि आने वाले समय में एक बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन की नींव भी रखेगा।

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