Kurukshetra Gurudwara Chathi Patshahi: जब चंदू के नाक में नकेल डाल लाहौर जाते वक्त कुरुक्षेत्र रुके थे गुरु हरगोबिंद सिंह साहिबकुरुक्षेत्र में गुरुद्वारा छठी पातशाही क्यों है खास? जहां गुरु साहिब ने नेत्रहीन माई को दी थी आंखों की रोशनी
  • धर्मनगरी में दो बार चरण पाए थे सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद सिंह महाराज ने  
  • सिखों की आस्था का अटूट केंद्र है गुरुद्वारा छठी पातशाही

Kurukshetra Gurudwara Chathi Patshahi: सतविंद्र सिंह, जगमार्ग न्यूज | सिख इतिहास और भारत की आध्यात्मिक चेतना में कुरुक्षेत्र का स्थान बेहद विशिष्ट रहा है। यह वह पावन धरा है जहां सिखों के कई गुरुओं के चरण पड़े, लेकिन सिखों के छठे गुरु, मीरी-पीरी के मालिक श्री गुरु हरगोबिंद सिंह साहिब जी का आगमन इस नगरी के लिए एक युगांतकारी घटना थी।

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि गुरु साहिब ने अपने जीवनकाल में दो बार इस धर्मनगरी को निहाल किया। आज जहां गुरुद्वारा पातशाही छठी सुशोभित है, वह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का वह अटूट केंद्र है जो सदियों से मानवता और सेवा का संदेश दे रहा है। गुरु साहिब के प्रकाश पर्व के पावन अवसर पर कुरुक्षेत्र का यह परिसर शबद-कीर्तन और गुरुवाणी के सुरों से सराबोर है।

चंदू की नकेल कसने से लेकर नानकमता की पुनर्स्थापना तक: गुरु साहिब के कुरुक्षेत्र प्रवास की गाथा

इतिहासकारों और गुरुद्वारा प्रबंधकों के अनुसार, सतगुरु जी का पहला आगमन मई 1622 ई. में हुआ था। यह वह दौर था जब गुरु साहिब जहांगीर की कैद से ग्वालियर के किले से मुक्त होने के बाद, सिखों के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के मुख्य दोषी चंदू को उसके कर्मों की सजा देने के लिए लाहौर ले जा रहे थे। कुरुक्षेत्र पहुंचकर उन्होंने सन्निहित सरोवर (सूर्यकुंड) के समीप एक ऊंचे मिट्टी के टीले पर अपना डेरा स्थापित किया।

इसके बाद, दूसरी बार वे तब कुरुक्षेत्र आए जब भाई अलमस्त जी की पुकार पर उन्होंने सिद्धों के कब्जे से गुरु नानक देव जी के पवित्र स्थान ‘नानकमता’ (जिसे सिद्धों ने गोरखमता बना दिया था) को मुक्त कराया। वहां गुरु नानक देव जी की यादगारी पीपल के पेड़ को पुनर्जीवित करने के बाद, जब गुरु साहिब अपने 50 घुड़सवारों के साथ वापस लौट रहे थे, तब उन्होंने दोबारा इसी स्थान पर विश्राम किया। इसी प्रवास के दौरान उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से एक नेत्रहीन बुजुर्ग महिला की आंखों की ज्योति लौटाई और एक कुष्ठ रोगी फकीर को इस असाध्य बीमारी से मुक्ति देकर लोक-कल्याण का संदेश दिया।

जब 1947 के शरणार्थियों का संबल बना गुरु का दर: कुरुक्षेत्र कैंप की वो ऐतिहासिक अरदास

इस गुरुद्वारे की प्राचीर सिर्फ मध्यकालीन इतिहास की ही गवाह नहीं है, बल्कि इसने आधुनिक भारत के सबसे बड़े विस्थापन का दर्द भी करीब से देखा है। सन् 1947 में देश के विभाजन के वक्त पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) से अपना सब कुछ गंवाकर भूखे-प्यासे कुरुक्षेत्र के तंबू वाले कैंपों में पहुंचे सिख शरणार्थियों के लिए यह गुरुद्वारा उम्मीद की पहली किरण बना था।

बेघर और बेरोजगार हो चुके इन परिवारों ने गुरुद्वारा छठी पातशाही के चरणों में शीश नवाया और नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की शक्ति मांगी। इस पवित्र स्थान पर की गई अरदास का ही असर था कि यहाँ से निकलकर इन परिवारों ने दिल्ली और देश के अन्य बड़े महानगरों में शून्य से अपने साम्राज्य खड़े किए। आज वे देश के बड़े नामी उद्योगपति और कारोबारी हैं। गुरु साहिब के इसी उपकार का आभार जताने के लिए ये परिवार आज भी हर साल प्रकाश पर्व पर कुरुक्षेत्र आते हैं और विशेष शुकराने के पाठ आयोजित करवाते हैं।

धार्मिक परंपरा और समागम की रूपरेखा

Kurukshetra Gurudwara Chathi Patshahi: जब चंदू के नाक में नकेल डाल लाहौर जाते वक्त कुरुक्षेत्र रुके थे गुरु हरगोबिंद सिंह साहिब
कुरुक्षेत्र में 29 जून को सजेगा भव्य नगर कीर्तन, 30 जून को समागम का समापन

दशकों पुरानी है श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी की परंपरा

गुरुद्वारा साहिब पातशाही छठी के प्रबंधक हरमीत सिंह ने बताया कि इस ऐतिहासिक परिसर में प्रकाश पर्व को मनाने का तरीका बेहद अनूठा और पारंपरिक है। यहाँ दशकों से प्रकाश पर्व पर लगातार अखंड पाठ साहिब की लड़ी (श्रृंखला) रखने की परंपरा चली आ रही है।

इस वर्ष भी तीन अलग-अलग लड़ियों में श्री अखंड पाठ साहिब के पाठ रखे गए हैं। 24 जून से शुरू हुआ यह धार्मिक उत्सव अपने चरम पर है। 29 जून को गुरु ग्रंथ साहिब जी की छत्रछाया और पंच प्यारों की अगुवाई में एक विशाल एवं भव्य नगर कीर्तन सजाया जाएगा, जो कुरुक्षेत्र के विभिन्न मार्गों से गुजरेगा। इसके अगले दिन यानी 30 जून को तीसरी लड़ी के भोग डाले जाएंगे, जिसके बाद मुख्य दीवान में रागी, ढाडी और कथावाचक संगत को गुरु इतिहास से जोड़ेंगे और इस भव्य प्रकाश उत्सव का समापन होगा।