Parenting tips: आज के दौर में बच्चों की जीवनशैली काफी बदल चुकी है। स्कूल से घर लौटने के बाद होमवर्क, ट्यूशन और उसके बाद मोबाइल या टेलीविजन स्क्रीन के आगे समय बिताना बच्चों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया है। इस व्यस्त और तकनीक-केंद्रित दिनचर्या में धीरे-धीरे वह चीज पीछे छूटती जा रही है, जो बचपन की सबसे खूबसूरत और जरूरी पहचान हुआ करती थी—यानी मैदानों में खुलकर खेलना। सेलिब्रिटी न्यूट्रिशनिस्ट रुजुता दिवेकर ने इस4 विषय पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए बताया है कि आज की पीढ़ी को वह न्यूनतम शारीरिक गतिविधि भी नहीं मिल पा रही है, जो स्वस्थ शरीर के लिए अनिवार्य है।
रोजाना एक घंटा खेलना क्यों है जरूरी?
विशेषज्ञों और वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों का मानना है कि बच्चों का बचपन केवल किताबों तक सीमित नहीं होना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, 5 से 17 वर्ष की आयु के बच्चों और किशोरों को सप्ताह के सातों दिन औसतन रोजाना कम से कम एक घंटा (60 मिनट) ऐसी शारीरिक गतिविधियों में बिताना चाहिए जिससे उनका शरीर सक्रिय रहे। इसमें दौड़ना, साइकिल चलाना, रस्सी कूदना, फुटबॉल या अन्य आउटडोर खेल शामिल हैं।
रुजुता दिवेकर ‘फ्री प्ले’ यानी स्वतंत्र खेल पर जोर देती हैं, जहां बच्चे किसी तयशुदा नियम या कोचिंग के दबाव के बिना अपनी मर्जी से दौड़ें, कूदें और दोस्तों के साथ खेलें। इस तरह की सक्रियता से बच्चों की बढ़ती उम्र में हड्डियां और मांसपेशियां मजबूत होती हैं, जोड़ों का संतुलन बेहतर बनता है और शरीर का सही विकास होता है।
दिल, फेफड़ों और मोटापे से सुरक्षा
जब बच्चे मैदान पर दौड़-भाग करते हैं, तो उनके दिल की धड़कन और सांस लेने की गति तेज होती है, जिससे उनके कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम (दिल और फेफड़ों) को बेहतर तरीके से काम करने का अभ्यास मिलता है। इसके अलावा, आज के समय में बच्चों में तेजी से बढ़ रहे मोटापे की एक बड़ी वजह शारीरिक गतिविधियों में कमी आना भी है। नियमित रूप से खेलने से शरीर की अतिरिक्त ऊर्जा खर्च होती है और वजन को संतुलित रखने में मदद मिलती है। हालांकि, इसके साथ पौष्टिक खानपान और पूरी नींद का होना भी उतना ही आवश्यक है।
आत्मविश्वास और मानसिक विकास
खेलकूद का असर केवल शारीरिक सेहत पर नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा पड़ता है। मैदान पर अन्य बच्चों के साथ खेलते हुए वे टीम वर्क सीखते हैं, अपनी बारी का इंतजार करना समझते हैं और हार-जीत को सकारात्मक रूप से स्वीकार करना सीखते हैं। ऐसे छोटे-छोटे अनुभव उन्हें भविष्य की बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं।
माता-पिता को यह समझने की जरूरत है कि यदि पढ़ाई या ट्यूशन का दबाव बच्चों के खेलने के समय को पूरी तरह से निगल रहा है, तो अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करना चाहिए। बच्चों की दिनचर्या में पढ़ाई और खेल दोनों के बीच संतुलन होना बेहद जरूरी है ताकि एक स्वस्थ, ऊर्जावान और आत्मविश्वासी पीढ़ी का निर्माण हो सके।
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