Pehowa News: पिहोवा (अभिषेक पूर्णिमा)। श्राद्ध पक्ष के अंतिम पड़ाव यानी सर्व पितृ अमावस्या के पावन पर्व पर शनिवार को धर्मनगरी पिहोवा का ऐतिहासिक सरस्वती तीर्थ (पृथूदक) श्रद्धालुओं की आस्था से सराबोर नजर आया। देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने अहले सुबह से ही पावन सरस्वती सरोवर में आस्था की डुबकी लगानी शुरू कर दी थी। मान्यता है कि श्राद्ध अमावस्या के दिन इस पवित्र तीर्थ पर स्नान करने और पूर्वजों के निमित्त अनुष्ठान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और कुल में सुख-शांति बनी रहती है।
विधि-विधान से संपन्न हुए पिंडदान और तर्पण
स्नान के पश्चात श्रद्धालुओं ने घाटों पर अपने पुरोहितों के मार्गदर्शन में पितरों की आत्मिक शांति के लिए पिंडदान, महालया तर्पण और अन्य वैदिक कर्मकांड पूरे विधि-विधान से संपन्न किए। धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला में श्रद्धालुओं ने प्रेत पीपल पर जल अर्पित कर उसकी परिक्रमा की और कच्चा सूत बांधा। लोक मान्यता के अनुसार, प्रेत पीपल पर कच्चा सूत बांधने से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा होती है। इसके बाद श्रद्धालुओं ने तीर्थ परिसर स्थित प्राचीन स्वामी कार्तिकेय मंदिर में मथा टेककर तेल अर्पित किया और परिवार की समृद्धि की प्रार्थना की।
13 गुना फल देता है पृथूदक तीर्थ का पुण्य
तीर्थ पुरोहित पंडित राहुल कौशिक ने जानकारी देते हुए बताया कि शास्त्रों और पुराणों में पिहोवा यानी प्राचीन पृथूदक तीर्थ का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि इस तीर्थ पर किए गए पाप और पुण्य का कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। अनुष्ठान संपन्न करने के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिरों में पूजा-अर्चना की और जरूरतमंदों व भिक्षुकों को अन्न-धन का दान देकर पुण्य अर्जित किया।
दूसरी ओर, तीर्थ पुरोहित सुभाष पौलस्त्य और रवि शर्मा ने बताया कि पिहोवा का यह पावन स्थल सदियों से श्राद्ध और तर्पण कर्म के लिए देश भर में मुख्य केंद्र रहा है। यही वजह है कि देश के कोने-कोने से लोग अपने पितरों की तृप्ति के लिए यहां पहुंचते हैं, जिससे पूरा तीर्थ परिसर वैदिक मंत्रोच्चार और हर-हर गंगे के जयकारों से गूंज उठा।

