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Ram Rahim Case: राम रहीम की सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में तीखी बहस, वकीलों ने उठाए CBI जांच पर सवाल

AAmandeep Singh
Ram Rahim Case: राम रहीम की सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में तीखी बहस, वकीलों ने उठाए CBI जांच पर सवाल
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हरियाणा। साध्वी यौन शोषण मामले में सजा भुगत रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान नया मोड़ आ गया है। बचाव पक्ष के वकीलों ने सीबीआई की तफ्तीश और निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) की न्याय प्रक्रिया को सीधे कटघरे में खड़ा किया है। हाई कोर्ट के समक्ष दलील देते हुए डेरा प्रमुख के कानूनी अमले ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने इस पूरे मामले में कई अहम बयानों को जानबूझकर दबाया और पूरी कहानी अत्यधिक देरी और विरोधाभासों के सहारे बुनी गई है।

2005 तक नहीं था दुष्कर्म का जिक्र, बाद में बदले गए बयान: बचाव पक्ष

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सुनवाई के दौरान राम रहीम के सीनियर काउंसिल ने तारीखों का ब्योरा देते हुए एक बड़ा कानूनी बिंदु उठाया। उन्होंने कहा कि कथित घटनाएं साल 1999 की बताई जा रही हैं, लेकिन इस मामले में दुष्कर्म (Rape) का संगीन आरोप पहली बार साल 2006 में दर्ज किया गया। वकीलों ने तर्क दिया कि साल 2002 से 2005 के बीच पीड़िता द्वारा दर्ज कराए गए कई बयानों में ऐसा कोई जिक्र ही नहीं था। यहां तक कि 25 फरवरी 2005 के बयान में भी केवल दूसरे विवादों का उल्लेख था। बचाव पक्ष का आरोप है कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के उन तीन बयानों (एक्सकुलपेटरी स्टेटमेंट) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जो डेरा प्रमुख को निर्दोष साबित करते थे।

2001 के पत्र से 1999 में ब्लैकमेलिंग कैसे? लव लेटर पर कानूनी पेंच

अदालत के भीतर उस कथित ‘लव लेटर’ का मुद्दा भी गरमाया, जिसे सीबीआई ने मुख्य साक्ष्य के तौर पर पेश किया था। बचाव पक्ष के वकील जितेंद्र खुराना ने जिरह करते हुए कहा:

“अभियोजन पक्ष की कहानी के मुताबिक, 1999 में पीड़िता पर एक प्रेम पत्र दिखाकर दबाव बनाया गया था। लेकिन जब हम अदालती रिकॉर्ड और सबूतों को देखते हैं, तो वह पत्र साल 2001 का है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो पत्र 2001 में लिखा गया, उसके जरिए कोई शख्स दो साल पहले यानी 1999 में किसी को कैसे ब्लैकमेल कर सकता है? यह तथ्य ही पूरी कहानी को मनगढ़ंत साबित करने के लिए काफी है।”

गुफा की लोकेशन और जांच अधिकारी की निष्पक्षता पर भी उंगली

बचाव पक्ष ने घटनास्थल को लेकर पैदा हुई अस्पष्टता का भी जिक्र किया। चार्जशीट में केवल ‘डेरा सच्चा सौदा परिसर स्थित गुफा’ लिखा गया है, जबकि गवाहों के बयानों में पुराने और नए डेरे का जिक्र है, जो एक-दूसरे से करीब 7-8 किलोमीटर दूर हैं और दोनों ही जगहों पर गुफाएं मौजूद हैं। इसके अलावा, मामले के जांच अधिकारी (IO) इंस्पेक्टर सतीश डागर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि उन्होंने पीड़िता के दुष्कर्म का आरोप लगाने से पहले ही, साल 2005 में यौन शोषण से जुड़े सवालों का ड्राफ्ट तैयार कर लिया था, जो उनकी पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता को दर्शाता है। साथ ही आरोपी का कोई मेडिकल टेस्ट भी नहीं कराया गया।

‘धारणा और सामाजिक प्रभाव पर हुआ फैसला’, अब जुलाई में अगली जंग

डेरा प्रमुख के वकीलों ने साफ तौर पर कहा कि पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने अपने फैसले में ‘असाधारण परिस्थितियों में असाधारण उपाय’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जो स्थापित कानून और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की कसौटियों से परे हैं। कोर्ट को साक्ष्यों के आधार पर फैसला करना चाहिए था, न कि सामाजिक दबाव या किसी पूर्व-निर्धारित धारणा पर। फिलहाल, हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई जुलाई तक के लिए टाल दी है। बता दें कि अगस्त 2017 में पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने राम रहीम को दो साध्वियों के यौन शोषण में 10-10 साल की सजा और 30 लाख 20 हजार रुपये का जुर्माना सुनाया था।

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